भारत ने 2030 का Ethanol blending का लक्ष्य 2025 में ही पूरा कर लिया है। हालांकि यह एनर्जी सिक्योरिटी के लिए बड़ी जीत है, लेकिन अब कंपनियों के सामने रॉ-मटीरियल (Feedstock) और सरकारी रेगुलेशंस की नई चुनौतियां खड़ी हो गई हैं।
भारत का फ्यूल लैंडस्केप पूरी तरह बदल चुका है। देश ने 20% इथेनॉल ब्लेंडिंग (E20) का लक्ष्य तय समय से 5 साल पहले ही हासिल कर लिया है। इसका मुख्य उद्देश्य ऑयल इंपोर्ट के बिल को कम करना था, लेकिन अब यह मामला 'एनर्जी इंडिपेंडेंस' और 'फूड सिक्योरिटी' के बीच उलझता दिख रहा है।
कैपेसिटी और डिमांड का गणित
इंडस्ट्री ने इंफ्रास्ट्रक्चर पर जोरदार निवेश किया है और अब कुल इंस्टॉल्ड कैपेसिटी लगभग 20 बिलियन लीटर तक पहुंच गई है। निवेशकों के लिए असली पेंच 'कैपेसिटी यूटिलाइजेशन' में फंसा है। केवल प्लांट होने से प्रॉफिट नहीं बढ़ेगा, अगर सरकार की ब्लेंडिंग पॉलिसी में बदलाव होता है या डिमांड और सप्लाई में संतुलन नहीं रहता, तो मुनाफा सीधे प्रभावित होगा।
'फूड वर्सेस फ्यूल' का विवाद
सरकार अब महंगाई को काबू में रखने के लिए सख्त रुख अपना रही है। गन्ने के रस (Sugarcane juice) के उपयोग पर पाबंदी और शुगर इंपोर्ट पर ढील इस बात का सबूत है कि सरकार फूड सप्लाई को प्राथमिकता दे रही है। इससे उन शुगर और डिस्टिलरी कंपनियों का मार्जिन प्रभावित हो रहा है, जो मुख्य रूप से गन्ने या मोलासेस पर निर्भर हैं।
अनाज की ओर बढ़ता झुकाव
कंपनियों को अब मजबूरी में मक्का (Maize) और खराब चावल (Damaged rice) जैसे अनाज आधारित रॉ-मटीरियल की ओर शिफ्ट होना पड़ रहा है। यह बदलाव नए रिस्क लेकर आया है, क्योंकि अनाज की कीमतों में उतार-चढ़ाव और प्रोक्योरमेंट नेटवर्क को मैनेज करना चुनौतीपूर्ण है। साथ ही, वॉटर-इंटेंसिव फसलों को लेकर रेगुलेटरी चिंताएं भी बढ़ रही हैं।
अगले कुछ क्वार्टर्स में निवेशकों को कंपनियों की मार्जिन मैनेज करने की क्षमता और नॉन-शुगर आधारित रॉ-मटीरियल में शिफ्ट होने की गति पर बारीकी से नजर रखनी चाहिए।
