भारत में इथेनॉल की भारी 'ग्लूट': पॉलिसी गैप से किसानों पर संकट, जानिए पूरा मामला!

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AuthorSaanvi Reddy|Published at:
भारत में इथेनॉल की भारी 'ग्लूट': पॉलिसी गैप से किसानों पर संकट, जानिए पूरा मामला!
Overview

भारत का इथेनॉल सेक्टर एक बड़ी समस्या से जूझ रहा है - मांग से कहीं ज़्यादा प्रोडक्शन! इंडस्ट्री की कैपेसिटी (capacity) इतनी ज़्यादा बढ़ गई है कि ई20 पेट्रोल ब्लेंडिंग (petrol blending) के लिए ज़रूरी मांग भी पूरी नहीं हो पा रही। इस पॉलिसी-ड्रिवन (policy-driven) गड़बड़ी का सीधा असर किसानों पर पड़ रहा है और इथेनॉल डिस्टिलरीज़ (distilleries) भी बेकार पड़ी हैं। अब सवाल यह है कि ई20 के बाद, भारत के मुख्य फ्यूल, डीज़ल (diesel) में इथेनॉल को मिलाने की राह कितनी आसान या मुश्किल होगी?

कैपेसिटी का सिरदर्द: पॉलिसी और ज़मीनी हकीकत में बड़ा गैप

यह परफॉरमेंस गैप (performance gap) दिखाता है कि किस तरह महत्वाकांक्षी रिन्यूएबल एनर्जी पॉलिसी (renewable energy policy) और उसके प्रैक्टिकल इम्प्लीमेंटेशन (practical implementation) के बीच एक बड़ी खाई है। जहां भारत की इथेनॉल इंडस्ट्री की इंस्टॉल कैपेसिटी (installed capacity) लगभग 20 अरब लीटर तक पहुंच गई है, और 4 अरब लीटर और जुड़ने की उम्मीद है। वहीं, इस फाइनेंशियल ईयर (financial year) में ई20 पेट्रोल ब्लेंडिंग (petrol blending) के लिए ज़रूरी डिमांड (demand) लगभग 11 अरब लीटर ही है।

इसका सीधा मतलब है कि सेक्टर 50% से ज़्यादा अतिरिक्त कैपेसिटी (excess capacity) से जूझ रहा है। यह एक ऐसी पॉलिसी का नतीजा है जो स्पष्ट लॉन्ग-टर्म स्ट्रैटेजी (long-term strategy) से कहीं आगे निकल गई। रिपोर्ट्स के मुताबिक, डिस्टिलरीज़ (distilleries) अपनी पोटेंशियल का केवल 25-30% ही इस्तेमाल कर पा रही हैं। इस कम ऑफटेक (offtake) के कारण लगभग ₹50,000 करोड़ की इंडस्ट्री भारी दबाव में है, जिससे इथेनॉल का स्टॉक (inventory) बहुत ज़्यादा जमा हो गया है। नए प्लांट्स (plants) के अप्रूवल (approvals) फिलहाल रोक दिए गए हैं, जो इस समस्या से निपटने की फौरन ज़रूरत को दर्शाता है।

इस दबाव के बावजूद, इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन (IOC) और भारत पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन (BPCL) जैसी बड़ी ऑयल मार्केटिंग कंपनियों (OMCs) का मार्केट कैप (market cap) काफी बड़ा है - IOC लगभग ₹1.8 ट्रिलियन और BPCL लगभग ₹1.2 ट्रिलियन है, जिनके P/E रेश्यो (P/E ratios) क्रमशः 12.5x और 10.8x हैं। इनके शेयर का परफॉरमेंस (performance) भले ही एनर्जी सेक्टर की व्यापक गतिशीलता को दर्शाता हो, लेकिन बायोफ्यूल (biofuel) पर सरकार की बदलती रणनीति और अतिरिक्त इथेनॉल को सोखने की उनकी क्षमता इन पर बढ़ता हुआ असर डाल रही है।

डीज़ल का फ्रंटियर: एक मुश्किल अगला कदम

पेट्रोल ब्लेंडिंग के ई20 टारगेट (target) पर प्रभावी रूप से ठहर जाने के बाद, अब ध्यान डीज़ल मार्केट की ओर जा रहा है, जो भारत में कहीं ज़्यादा बड़ी कंजम्पशन बेस (consumption base) है। लेकिन डीज़ल में इथेनॉल को मिलाना सीधा नहीं है। पेट्रोल के विपरीत, इथेनॉल स्वाभाविक रूप से डीज़ल के साथ आसानी से नहीं घुलता, जिसके लिए 'कपलर्स' (coupler chemicals) जैसे एडिटिव्स (additives) की ज़रूरत पड़ती है।

IOC और BPCL जैसी कंपनियाँ इन फॉर्मूलेशन (formulations) पर रिसर्च कर रही हैं, लेकिन इस बदलाव में कई तकनीकी चुनौतियाँ हैं। इनमें फ्यूल की स्टेबिलिटी (stability) के मुद्दे, इंजन की कम्पैटिबिलिटी (engine compatibility) और लंबे समय तक चलने की ड्यूरेबिलिटी (durability) को लेकर सवाल शामिल हैं। दुनिया भर में, भारत की आक्रामक कैपेसिटी बढ़ाने की रफ्तार कई देशों से आगे निकल गई है। ब्राजील जैसे देशों ने ज़्यादा ब्लेंड हासिल किए हैं, लेकिन वहां फीडस्टॉक (feedstock) और इंजन टेक्नोलॉजी (engine technology) अलग थी। वहीं, अमेरिका और यूरोप (EU) ने कहीं ज़्यादा मामूली टारगेट रखे हैं। यह भारत की इथेनॉल-डीज़ल ब्लेंडिंग को एक अनोखा और जटिल काम बनाता है, जो स्थापित अंतरराष्ट्रीय मॉडलों से अलग है।

⚠️ बीयर केस: एग्रीकल्चरल डिस्ट्रेस और टेक्निकल हर्डल्स

सरकार की महत्वाकांक्षी योजनाओं, जैसे कि किसानों की आय बढ़ाना और क्रूड ऑयल (crude oil) के इम्पोर्ट (imports) को कम करना, के चलते इथेनॉल कैपेसिटी में तेज़ी से हुई बढ़ोतरी ने अनजाने में कृषि क्षेत्र (agricultural sector) में भारी परेशानी पैदा कर दी है। ओवरसप्लाई (oversupply) ने गन्ने (sugarcane) और अनाज (food grains) की कीमतें गिरा दी हैं, जिसका सीधा असर उन किसानों पर पड़ रहा है जिन्हें इथेनॉल प्रोडक्शन (production) से एक स्थिर आय का ज़रिया बनाने के लिए प्रोत्साहित किया गया था।

इसके अलावा, लॉन्ग-टर्म रोडमैप (long-term roadmap) से पहले पॉलिसी की यह दौड़ इंडस्ट्री को कमज़ोर बना रही है। अमेरिका या यूरोप (EU) जैसे बाज़ारों में बायोफ्यूल को धीरे-धीरे अपनाने के विपरीत, भारत ने तेज़ी से, कैपेसिटी-फर्स्ट एप्रोच (capacity-first approach) अपनाया है। यह इंडस्ट्री को अतिरिक्त सप्लाई के लिए डिमांड सॉल्यूशंस (demand solutions) खोजने के दबाव में डालता है, खासकर तकनीकी रूप से चुनौतीपूर्ण डीज़ल सेगमेंट (diesel segment) में। वहां परफॉरमेंस के मुद्दे IOC और BPCL जैसी OMCs के लिए बड़े रेपुटेशनल (reputational) और आर्थिक जोखिम (economic risks) पैदा कर सकते हैं। ई20 से आगे ब्लेंडिंग परसेंटेज़ (blending percentages) बढ़ाने पर रेगुलेटरी पैरालिसिस (regulatory paralysis), जो आंशिक रूप से वाहनों की कम्पैटिबिलिटी (vehicle compatibility) और फ्यूल एफिशिएंसी (fuel efficiency) को लेकर ग्राहकों की चिंताओं के कारण है, समस्या को और बढ़ाता है।

फ्यूचर आउटलुक

भारत के इथेनॉल इंडस्ट्री का भविष्य सरकार की निर्णायक कार्रवाई पर निर्भर करता है। इंडस्ट्री एसोसिएशन (Industry associations) क्षमता के सही इस्तेमाल और निवेश को सुरक्षित करने के लिए ई20 से आगे ब्लेंडिंग परसेंटेज़ (blending percentages) बढ़ाने की वकालत कर रहे हैं। हालांकि विश्लेषक (analysts) IOC और BPCL जैसी प्रमुख OMCs पर सकारात्मक रेटिंग (positive ratings) बनाए हुए हैं, जो मजबूत डाउनस्ट्रीम डिमांड (downstream demand) का हवाला देते हैं, लेकिन बायोफ्यूल सेक्टर की लॉन्ग-टर्म वायबिलिटी (long-term viability) एक अहम वॉचपॉइंट (watchpoint) बनी हुई है। यह रेगुलेटरी क्लेरिटी (regulatory clarity) और डीज़ल मार्केट में सफल टेक्नोलॉजी इंटीग्रेशन (technological integration) पर निर्भर करेगा।

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