कतर का वादा, फिर भी चिंताएं बरकरार
पश्चिम एशिया में भू-राजनीतिक तनाव के कारण वैश्विक ऊर्जा प्रवाह (global energy flows) पर बड़ा खतरा मंडरा रहा है। ऐसे में, भारत के मुख्य LNG और LPG सप्लायर कतर ने इन मुश्किल घड़ियों में समर्थन का आश्वासन दिया है। ये बातचीत भारत की ऊर्जा आपूर्ति को बनाए रखने और औद्योगिक उत्पादन व घरेलू ईंधन की उपलब्धता को खतरे में डालने वाले बढ़ते उतार-चढ़ाव से निपटने के लिए बेहद महत्वपूर्ण हैं। पश्चिम एशिया पर भारत की भारी निर्भरता, इसे सप्लाई में रुकावटों के प्रति बेहद संवेदनशील बनाती है, जिसके कारण कूटनीतिक प्रयास (diplomatic efforts) अब ऊर्जा सुरक्षा की रणनीति का अहम हिस्सा बन गए हैं।
भारत की निर्भरता और भू-राजनीतिक जोखिम
कतर पर भारत की भारी निर्भरता
भारत के पेट्रोलियम मंत्री श्री हरदीप सिंह पुरी ने 9-10 अप्रैल को दोहा का दौरा कर कतर के साथ ऊर्जा संबंधों को मजबूत किया। कतर भारत की ऊर्जा जरूरतों के लिए एक महत्वपूर्ण देश है, जो भारत की लगभग 45% लिक्विफाइड नेचुरल गैस (LNG) और 20% लिक्विफाइड पेट्रोलियम गैस (LPG) की आपूर्ति करता है। यह दौरा ऐसे समय में हुआ जब वैश्विक LNG मार्केट में तंगी है और सप्लाइज लगभग 20% कम हो गई हैं। कतर के रास लफतान LNG एक्सपोर्ट फैसिलिटी पर हुए हमलों के कारण प्रोडक्शन रुक गया था और कुछ लॉन्ग-टर्म कॉन्ट्रैक्ट्स पर 'फोर्स मेजर' (force majeure) की घोषणा करनी पड़ी थी, जिसने भारत के इंपोर्ट को मार्च 2026 में रिकॉर्ड निचले स्तर पर पहुंचा दिया। वहीं, ब्रेंट क्रूड ऑयल की कीमतें $100 प्रति बैरल के पार चली गई हैं, जो कि 60% का उछाल है। इससे भारत के इंपोर्ट बिल में सीधा इजाफा हुआ है और हर $10 के तेल की कीमत बढ़ने पर करंट अकाउंट डेफिसिट (current account deficit) के जीडीपी के 0.4-0.5% तक बढ़ने का अनुमान है।
पश्चिम एशिया का संकट और ऊर्जा सप्लाई
पश्चिम एशिया में ईरान पर हुए हमलों और उसके बाद हुई जवाबी कार्रवाई ने वैश्विक ऊर्जा सुरक्षा के लिए 'इतिहास का सबसे बड़ा खतरा' (greatest threat to global energy security) पैदा कर दिया है। अंतर्राष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (IEA) के अनुसार, हॉर्मुज की खाड़ी (Strait of Hormuz), जो वैश्विक तेल व्यापार का लगभग 20% और प्रतिदिन सी-बोर्न ऑयल का लगभग एक-चौथाई हिस्सा संभालती है, प्रभावी रूप से बंद हो गई है। इससे ऊर्जा प्रवाह बुरी तरह बाधित हुआ है। अनुमान है कि वैश्विक सप्लाई में तेल के लिए 11-12 मिलियन बैरल प्रति दिन और LNG सप्लाई में 20% की कटौती हुई है। भारत जैसे एशियाई बाजार, जो अपनी कुल ऊर्जा जरूरतों का लगभग आधा हिस्सा मध्य पूर्व से आयात करते हैं, कीमतों में भारी उछाल और संभावित कमी के प्रति विशेष रूप से संवेदनशील हैं।
भारत की विविध सप्लायर्स की तलाश
इन बढ़ते जोखिमों के जवाब में, भारत ने अपने एनर्जी सोर्सिंग को विविध (diversify) करने की कवायद तेज कर दी है। अब तक 27 देशों से कच्चा तेल (crude oil) आयात करने वाला भारत, अब लगभग 40 सप्लायर्स से खरीद कर रहा है। हालांकि, भारत अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया और रूस जैसे देशों से कतर की वॉल्यूम को पूरा करने के लिए आपूर्ति सुरक्षित करने की कोशिश कर रहा है, इन विकल्पों की अपनी चुनौतियां हैं। अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया से लंबी शिपिंग रूट के कारण माल भाड़ा (freight costs) काफी बढ़ जाता है, और लिमिटेड स्पॉट कार्गो के लिए प्रतिस्पर्धा भी तेज हो गई है। इसके अलावा, वैकल्पिक सप्लायर्स के पास मध्य पूर्व की आपूर्ति में हुई कमी को तेजी से पूरा करने की क्षमता की कमी हो सकती है, जो कॉन्ट्रैक्ट की सीमाओं या प्रोडक्शन बाधाओं के कारण हो सकती है।
बाजार की प्रतिक्रियाएं और रिजर्व
भारतीय इक्विटी मार्केट (Indian equity markets) ऐतिहासिक रूप से मध्य पूर्व के संघर्षों पर प्रतिक्रिया दिखाते रहे हैं, जिसमें गिरावट आमतौर पर तब तक सीमित रहती है जब तक कि रुकावटें आर्थिक विकास को नुकसान पहुंचाने के लिए पर्याप्त समय तक बनी न रहें। हालांकि, कच्चे तेल की कीमतों में लगातार वृद्धि से महंगाई (inflationary pressures) बढ़ती है और भारतीय रुपया (Indian Rupee) कमजोर होता है, जिससे इंपोर्ट की लागत बढ़ जाती है और करंट अकाउंट डेफिसिट (current account deficit) बढ़ सकता है। भारत लगभग 74 दिनों की इंपोर्ट कवरेज के लिए स्ट्रेटेजिक पेट्रोलियम रिजर्व (strategic petroleum reserves) बनाए रखता है, लेकिन लंबी और गंभीर सप्लाई रुकावटों के दौरान इन बफ़र्स की परीक्षा होती है।
गहरी संरचनात्मक कमजोरियां
भारत के एनर्जी सिक्योरिटी फ्रेमवर्क को गहरी संरचनात्मक कमजोरियों (structural vulnerabilities) से चुनौती मिल रही है। LNG सप्लाई का एक ही जगह केंद्रित होना, जिसमें अकेले कतर भारत की कुल LNG जरूरतों का लगभग 41.4% हिस्सा पूरा करता है, इंडस्ट्री के जोखिम प्रबंधन बेंचमार्क, जो एकल-स्रोत निर्भरता को 25% से नीचे रखने की सलाह देते हैं, से काफी अधिक है। यह निर्भरता हॉर्मुज की खाड़ी की निरंतर भेद्यता (vulnerability) से और बढ़ जाती है, जो एक महत्वपूर्ण समुद्री चोकपॉइंट है। हालांकि भारत का लक्ष्य 2030 तक अपने ऊर्जा मिश्रण में नेचुरल गैस की हिस्सेदारी 15% तक बढ़ाना है, LNG को 'ब्रिज फ्यूल' (bridge fuel) के रूप में उसकी आर्थिक व्यवहार्यता संदिग्ध है। सस्ता विकल्प जैसे कोयला और रिन्यूएबल एनर्जी के मुकाबले इंपोर्टेड LNG महंगी साबित होती है, जिससे इंफ्रास्ट्रक्चर का इस्तेमाल कम होता है। इसके अलावा, कतर एनर्जी (QatarEnergy) द्वारा 'फोर्स मेजर' की घोषणाएं भू-राजनीतिक संकटों के दौरान लॉन्ग-टर्म कॉन्ट्रैक्ट्स की अनिश्चितता को उजागर करती हैं। देश के ऊर्जा इंफ्रास्ट्रक्चर में एक ही, अस्थिर सप्लायर और एक महत्वपूर्ण पारगमन मार्ग पर निर्भरता के कारण प्रणालीगत जोखिम (systemic risks) हैं।
दीर्घकालिक ऊर्जा रणनीति
भू-राजनीतिक अस्थिरता और खंडित सप्लाई चेन के कारण, भारत की 2030 तक नेचुरल गैस की 15% हिस्सेदारी हासिल करने की एनर्जी ट्रांजिशन (energy transition) रणनीति को बड़ी चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। देश को तत्काल ऊर्जा सुरक्षा जरूरतों और महत्वाकांक्षी नेट-जीरो लक्ष्यों को संतुलित करने के लिए पावर जनरेशन, स्टोरेज और ग्रिड आधुनिकीकरण में लगभग $145 बिलियन के सालाना निवेश की आवश्यकता है। जबकि कतर जैसे सप्लायर्स के साथ कूटनीतिक जुड़ाव (diplomatic engagement) अल्पकालिक स्थिरता प्रदान करता है, दीर्घकालिक समाधान के लिए रिन्यूएबल एनर्जी स्रोतों की ओर अधिक आक्रामक रुख अपनाना और लचीला, विविध ऊर्जा इंफ्रास्ट्रक्चर विकसित करना आवश्यक है, ताकि अस्थिर वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं पर जीवाश्म ईंधन की निर्भरता से जुड़े अंतर्निहित जोखिमों को कम किया जा सके।