भारत की बैटरी स्टोरेज क्षमता Q1 2026 में 941% बढ़कर 5.9 GWh हो गई है। राजस्थान और गुजरात की अगुवाई में इस तेजी से रिन्यूएबल एनर्जी के 24/7 सप्लाई की ओर बड़ा कदम माना जा रहा है। निवेशक इस इंफ्रास्ट्रक्चर ग्रोथ के असर पर नज़र बनाए हुए हैं, साथ ही ऊंचे कैपिटल कॉस्ट और सप्लाई चेन पर निर्भरता जैसे जोखिमों को भी समझ रहे हैं।
क्या हुआ?
2026 की पहली तिमाही के दौरान भारत में एनर्जी स्टोरेज इंफ्रास्ट्रक्चर का बड़े पैमाने पर विस्तार हुआ है। Mercom India Research के आंकड़ों के मुताबिक, इस अवधि में ही देश में 4.6 गीगावाट-घंटे (GWh) की बैटरी एनर्जी स्टोरेज क्षमता जोड़ी गई। यह पिछली तिमाही की तुलना में 941% की जबरदस्त बढ़ोतरी है। मार्च 2026 तक, देश की कुल इंस्टॉल बैटरी स्टोरेज क्षमता बढ़कर 5.9 GWh तक पहुंच गई है।
इस विकास का मुख्य कारण सौर (Solar) और पवन (Wind) ऊर्जा की रुक-रुक कर होने वाली सप्लाई की समस्या को हल करने के लिए बड़े पैमाने पर प्रोजेक्ट्स का शुरू होना है। इस क्षमता में राजस्थान का हिस्सा सबसे अधिक 42% है, इसके बाद गुजरात 25% और महाराष्ट्र 9% पर है। इसके अलावा, इन प्रोजेक्ट्स के लिए 69 GWh स्टोरेज प्रोजेक्ट्स विभिन्न प्लानिंग या निर्माण चरणों में हैं।
स्टैंडअलोन स्टोरेज की ओर बदलाव
इन स्टोरेज प्रोजेक्ट्स की संरचना में बदलाव आ रहा है। स्टैंडअलोन एनर्जी स्टोरेज—यानी ऐसे प्रोजेक्ट जो किसी विशेष पावर प्लांट से जुड़े नहीं हैं—अब कुल क्षमता का 73% हैं। यह एक महत्वपूर्ण विकास है क्योंकि यह इन स्टोरेज सिस्टम को ग्रिड डिमांड सेंटरों या सबस्टेशनों के करीब स्थित करने की अनुमति देता है, जिससे पावर डिस्ट्रीब्यूशन नेटवर्क अधिक लचीला बनता है।
अन्य कॉन्फ़िगरेशन, जैसे कि 24/7 पावर सप्लाई के लिए सौर और पवन ऊर्जा को स्टोरेज के साथ जोड़ना, कुल क्षमता का 15% है। यह मॉडल भारत के 24/7 रिन्यूएबल एनर्जी सप्लाई के लक्ष्य को हासिल करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है।
निवेशकों के लिए यह क्यों मायने रखता है?
निवेशकों के लिए, स्टोरेज क्षमता में तेजी से हो रही यह बढ़ोतरी भारतीय ऊर्जा सेक्टर में एक बड़े संरचनात्मक बदलाव का संकेत देती है। सालों से, रिन्यूएबल एनर्जी इंडस्ट्री इस समस्या से जूझ रही थी कि सौर और पवन ऊर्जा हर समय उपलब्ध नहीं होती। एनर्जी स्टोरेज इस कमी को पूरा करने का काम करता है, जिससे ये सोर्स विश्वसनीय बनते हैं।
पावर डेवलपमेंट, इंजीनियरिंग, प्रोक्योरमेंट और कंस्ट्रक्शन (EPC) से जुड़ी कंपनियां जो रिन्यूएबल सेक्टर में काम कर रही हैं, वे इन स्टोरेज प्रोजेक्ट्स पर अपना फोकस बढ़ा रही हैं। पहली तिमाही में 4 गीगावाट से अधिक के स्टैंडअलोन स्टोरेज प्रोजेक्ट्स की सफल नीलामी (Auction) हुई है, जो इस सेगमेंट में बढ़ते बाजार को दर्शाता है। जैसे-जैसे अधिक स्टोरेज क्षमता ऑनलाइन आएगी, यह रिन्यूएबल एनर्जी कंपनियों को अधिक प्रीमियम पावर सप्लाई कॉन्ट्रैक्ट्स में प्रवेश करने का अवसर दे सकती है।
जोखिम और चुनौतियां
हालांकि यह बढ़ोतरी प्रभावशाली है, लेकिन इस सेक्टर में कई जोखिम हैं जिन पर निवेशकों को नजर रखनी चाहिए। सबसे बड़ी चुनौती बैटरी स्टोरेज सिस्टम की उच्च कैपिटल कॉस्ट है। इन प्रोजेक्ट्स के लिए भारी अपफ्रंट निवेश की आवश्यकता होती है, जो डेवलपर्स के बैलेंस शीट पर दबाव डालता है। यदि बैटरी की लागत ऊंची बनी रहती है, तो यह प्रॉफिट मार्जिन को प्रभावित कर सकता है।
एक और बड़ा जोखिम बैटरी सेल के आयात पर देश की निर्भरता है। इन स्टोरेज सिस्टम के लिए आवश्यक अधिकांश टेक्नोलॉजी और कच्चा माल अंतरराष्ट्रीय बाजारों से सोर्स किया जाता है। यह सेक्टर को सप्लाई चेन में रुकावटों, भू-राजनीतिक तनावों और मुद्रा में उतार-चढ़ाव के प्रति संवेदनशील बनाता है। इसके अतिरिक्त, टेक्नोलॉजी खुद तेजी से विकसित हो रही है, जिसका मतलब है कि आज के इंस्टॉलेशन भविष्य में नई, सस्ती टेक्नोलॉजी की तुलना में कम कुशल हो सकते हैं।
निवेशकों को आगे क्या देखना चाहिए?
निवेशकों को सरकारी टेंडरों और नीलामी की सफलता दर पर कड़ी नजर रखनी चाहिए, क्योंकि यही प्रोजेक्ट पाइपलाइनों के मुख्य चालक हैं। सरकार की वायबिलिटी गैप फंडिंग (VGF) योजनाएं—जो प्रोजेक्ट्स को वहनीय बनाने के लिए वित्तीय सहायता प्रदान करती हैं—भी महत्वपूर्ण होंगी।
अन्य प्रमुख क्षेत्रों में बैटरी के लिए कच्चे माल की कीमतों का रुझान और पंपड स्टोरेज पाइपलाइन की प्रगति शामिल है। अंत में, गुजरात और राजस्थान जैसे राज्यों द्वारा घोषित बड़ी पाइपलाइन की कमीशनिंग टाइमलाइन पर नजर रखने से यह पता चलेगा कि क्या कंपनियां इन प्रोजेक्ट्स को बिना किसी देरी या लागत वृद्धि के पूरा कर सकती हैं।
