एनर्जी सिक्योरिटी: सिर्फ स्टॉक नहीं, एक बड़ा प्लान
भारत अपनी ऊर्जा सुरक्षा को लेकर एक बड़ा और सोफिस्टिकेटेड प्लान चला रहा है। देश के पास 25 करोड़ बैरल (लगभग 4,000 करोड़ लीटर) से ज़्यादा का स्ट्रेटेजिक रिज़र्व है, जो 7 से 8 हफ़्तों तक की ज़रूरत को पूरा कर सकता है। यह मात्रा बताती है कि हमारे रिज़र्व उम्मीद से ज़्यादा हैं।
सिर्फ रिज़र्व ही नहीं, भारत ने अपनी सप्लाई को भी काफी डाइवर्सिफाई किया है। पहले जहां हम 27 देशों से तेल इंपोर्ट (Import) करते थे, वहीं अब यह संख्या बढ़कर 40 हो गई है। इसका मतलब है कि हम स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज जैसे क्रिटिकल रूट्स पर कम निर्भर हैं। असल में, भारत के कुल क्रूड ऑयल इंपोर्ट का सिर्फ़ 40% ही स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज से आता है, बाकी सप्लाई रूस, अफ्रीका, अमेरिका और मध्य एशिया जैसे दूसरे रास्तों से आती है।
घरेलू स्तर पर, भारत की रिफाइनिंग कैपेसिटी (Refining Capacity) 258 मिलियन मीट्रिक टन प्रति वर्ष (MMTPA) तक पहुँच गई है, जो देश की ज़रूरत से ज़्यादा है। इतना ही नहीं, भारतीय रिफाइनरियों ने यूरोप में भी तेल की कमी को पूरा करने में मदद की है।
जियोपॉलिटिक्स और कंपनियों का भारी नुकसान
मार्च 2026 तक, रूस भारत का सबसे बड़ा क्रूड ऑयल सप्लायर बना हुआ है, और हम G7 देशों के प्राइस कैप रूल्स का पालन कर रहे हैं। हाल ही में एक यूएस ट्रेजरी वेवर (US Treasury Waiver) ने भी इंपोर्ट को आसान बना दिया है।
इसके अलावा, 20% इथेनॉल ब्लेंडिंग (Ethanol Blending) प्रोग्राम के ज़रिए हम सालाना करीब 44 मिलियन बैरल क्रूड ऑयल का इंपोर्ट कम कर रहे हैं, जो हमारी एनर्जी इंडिपेंडेंस (Energy Independence) के लिए बड़ा कदम है।
देश में रिटेल फ्यूल प्राइसेस (Retail Fuel Prices) पिछले 4 सालों से दिल्ली में बिल्कुल स्थिर हैं, जो दुनिया भर के मुकाबले एक बड़ी बात है। लेकिन इस दाम स्थिरता की भारी कीमत सरकारी तेल कंपनियों (PSUs) को चुकानी पड़ रही है। इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन, हिंदुस्तान पेट्रोलियम और भारत पेट्रोलियम ने पेट्रोल और डीज़ल पर ₹24,500 करोड़ और एलपीजी पर लगभग ₹40,000 करोड़ का लॉस उठाया है। कुल मिलाकर यह लॉस ₹64,500 करोड़ से ज़्यादा है।
ग्लोबल तुलना और भारत की चुनौतियाँ
जब एनर्जी सिक्योरिटी की बात आती है, तो भारत की 7-8 हफ़्तों की रिज़र्व क्षमता चीन (6 महीने) और जापान (8 महीने) जैसे देशों के मुकाबले कम है। इसका मतलब है कि लंबे समय तक चलने वाली ग्लोबल सप्लाई की दिक्कतों में भारत ज़्यादा वल्नरेबल (vulnerable) हो सकता है।
भले ही हमने इंपोर्ट सोर्सेज को 27 से 40 देशों तक फैला लिया हो, लेकिन हम अभी भी 85% से ज़्यादा क्रूड ऑयल के लिए इंपोर्ट पर निर्भर हैं। ऐसे में, स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज जैसे ज़रूरी रूट्स पर निर्भरता बनी हुई है, जो जियोपॉलिटिकल टेंशन के समय जोखिम बढ़ा सकती है।
विश्लेषकों का कहना है कि अगर रुपये का मूल्य गिरता है, तो इंपोर्ट महंगा हो जाएगा, जिससे कंपनियों के मार्जिन पर दबाव बढ़ेगा। वहीं, ONGC जैसी अपस्ट्रीम कंपनियों को बढ़ी हुई क्रूड कीमतों से फ़ायदा हो सकता है, लेकिन IOCL, HPCL, BPCL जैसी मार्केटिंग कंपनियों को तब नुकसान होगा जब वे रिटेल प्राइस नहीं बढ़ा पाएंगी।
चिंता की बात: क्या ये स्ट्रैटेजी टिकाऊ है?
सरकारी तेल कंपनियों पर ₹64,500 करोड़ का यह लॉस लंबे समय तक टिकाऊ नहीं है। 7-8 हफ़्तों का रिज़र्व भी ग्लोबल सप्लाई शॉक के लिए कम है। 85% से ज़्यादा इंपोर्ट पर निर्भरता और स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज जैसे चोकपॉइंट्स पर निर्भरता चिंता का विषय है। रूस से इंपोर्ट भले ही सस्ता हो, लेकिन यह अपने साथ नए जियोपॉलिटिकल रिस्क लाता है।
आगे क्या?
भारत एनर्जी सिक्योरिटी के लिए स्ट्रेटेजिक रिज़र्व बढ़ाने, सोर्सिंग डाइवर्सिफाई करने और डोमेस्टिक कैपेसिटी बढ़ाने पर काम कर रहा है। इथेनॉल ब्लेंडिंग और इलेक्ट्रिक व्हीकल्स (EVs) का बढ़ता इस्तेमाल क्लीन एनर्जी की ओर इशारा करता है।
हालांकि, PSUs के लिए यह भारी वित्तीय बोझ एक बड़ी चुनौती बना रहेगा, जिसके लिए भविष्य में पॉलिसी एडजस्टमेंट की ज़रूरत पड़ सकती है। एनालिस्ट्स का मानना है कि डाइवर्सिफिकेशन से मज़बूती मिलेगी, लेकिन भारत को लगातार बदलते जियोपॉलिटिकल माहौल और इंपोर्ट पर निर्भरता को मैनेज करते रहना होगा।