पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्री हरदीप सिंह पुरी ने सार्वजनिक रूप से कहा है कि मध्य पूर्व से उत्पन्न हो रही वर्तमान जियोपॉलिटिकल (geopolitical) उथल-पुथल के बीच भारत के पास ऊर्जा भंडार (energy reserves) पर्याप्त हैं। यह आश्वासन एक अनौपचारिक मीडिया बातचीत के दौरान दिया गया था, जिसका उद्देश्य संभावित आपूर्ति बाधाओं (supply disruptions) पर जनता और बाजार की चिंताओं को दूर करना था। हालांकि, यह बयान ऐसे समय आया है जब अंतरराष्ट्रीय तेल बेंचमार्क (oil benchmarks) इन घटनाओं पर तीखी प्रतिक्रिया दे रहे हैं। ब्रेंट क्रूड (Brent crude) की कीमतें बढ़कर लगभग $77-$82 प्रति बैरल हो गई हैं, जबकि WTI फ्यूचर्स (WTI futures) $70-$75 प्रति बैरल के बीच कारोबार कर रहा है। यह दर्शाता है कि बाजार में एक महत्वपूर्ण जियोपॉलिटिकल रिस्क प्रीमियम (geopolitical risk premium) शामिल हो गया है। यह प्राइस वोलेटिलिटी (price volatility) सीधे तौर पर भारत को प्रभावित करती है, जो अपनी लगभग 85-89% क्रूड ऑयल (crude oil) की जरूरतों को आयात करता है। अनुमान है कि क्रूड की कीमतों में प्रत्येक $1 की वृद्धि से भारत के वार्षिक इंपोर्ट बिल (import bill) में लगभग $2 अरब का इजाफा होता है, जो सीधे तौर पर महंगाई (inflation) और चालू खाता घाटे (current account deficit) को प्रभावित करता है।
भारत के स्ट्रेटेजिक रिजर्व की कहानी
जहां मंत्री जी ने भरोसा दिलाया है, वहीं आंकड़ों की बात करें तो भारत की स्ट्रेटेजिक पेट्रोलियम रिजर्व (SPR) कैपेसिटी (capacity) लगभग 39 मिलियन बैरल है। इसकी तुलना में, अमेरिका के पास 727 मिलियन बैरल से अधिक और चीन के पास अनुमानित 290 मिलियन बैरल का भंडार है। भले ही भारत की कुल राष्ट्रीय स्टोरेज कैपेसिटी, जिसमें कॉमर्शियल रिजर्व शामिल हैं, लगभग 74 दिनों की कुल नेट इंपोर्ट को कवर करती है, लेकिन इसका समर्पित SPR केवल लगभग 9.5 दिनों की आपातकालीन आपूर्ति के लिए ही काफी है। यह इंटरनेशनल एनर्जी एजेंसी (IEA) की सदस्य देशों के लिए कम से कम 90 दिनों के आपातकालीन भंडार बनाए रखने की गाइडलाइन (guideline) से काफी कम है। सरकार इस 90-दिवसीय लक्ष्य को पूरा करने के लिए काम कर रही है और SPR कैपेसिटी का विस्तार करने की योजनाएं भी हैं।
इंपोर्ट पर निर्भरता और डाइवर्सिफिकेशन की कोशिशें
भारत ने तेल इंपोर्ट के स्रोतों में डाइवर्सिफिकेशन (diversification) के लिए सक्रिय रूप से प्रयास किए हैं। उदाहरण के लिए, रूस से इंपोर्ट को 2025 की शुरुआत में 1.5 मिलियन बैरल प्रति दिन से घटाकर 2026 के जनवरी तक लगभग 436,000 बैरल प्रति दिन कर दिया गया है। मध्य पूर्व से इंपोर्ट, हालांकि ऐतिहासिक उच्च स्तर से कम हुआ है, फिर भी एनर्जी मिक्स (energy mix) का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बना हुआ है। भारत के लगभग 60% क्रूड का ट्रांजिट स्ट्रेट ऑफ होर्मुज (Strait of Hormuz) से होता है, जो वैश्विक तेल प्रवाह का लगभग 20% संभालता है। हाल के प्रयासों में अमेरिका से इंपोर्ट बढ़ाना और वेनेजुएला के साथ क्रूड इंपोर्ट के लिए फिर से बातचीत शुरू करना शामिल है। लेकिन, भारत की ऊर्जा जरूरतों की विशाल मात्रा और जियोपॉलिटिकल संवेदनशीलता का मतलब है कि स्ट्रेट ऑफ होर्मुज जैसे महत्वपूर्ण मैरीटाइम रूट्स (maritime routes) में किसी भी बड़ी बाधा से तत्काल खतरा पैदा हो सकता है।
एनर्जी PSUs का वैल्यूएशन
इस बीच, भारत की प्रमुख पब्लिक सेक्टर अंडरटेकिंग (PSU) एनर्जी कंपनियां जैसे भारत पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन लिमिटेड (BPCL), इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन लिमिटेड (IOCL) और ऑयल एंड नेचुरल गैस कॉर्पोरेशन लिमिटेड (ONGC) तुलनात्मक रूप से कम प्राइस-टू-अर्निंग्स (P/E) रेश्यो (ratios) पर कारोबार कर रही हैं। मार्च 2026 की शुरुआत के आंकड़ों के अनुसार, BPCL का P/E लगभग 6.5-7.5 है, IOCL का लगभग 7.7-8.1 है, और ONGC का 8.05-9.12 के बीच है। ये वैल्यूएशन (valuations) बताते हैं कि वर्तमान जियोपॉलिटिकल चिंताओं के बावजूद, बाजार इन कंपनियों के लिए किसी बड़े रिस्क प्रीमियम (risk premium) का पूरी तरह से हिसाब नहीं लगा रहा है।
सबसे बड़ा डर: चोकपॉइंट्स पर निर्भरता और सीमित भंडार
भारत की सबसे बड़ी कमजोरी स्ट्रेट ऑफ होर्मुज पर उसकी निर्भरता है। यदि यह रास्ता लंबे समय तक बंद या गंभीर रूप से बाधित होता है, तो यह वैश्विक बाजारों से प्रतिदिन 20 मिलियन बैरल से अधिक तेल को बाहर कर सकता है। हालांकि भारत के SPR और कॉमर्शियल स्टॉक एक बफर प्रदान करते हैं, लेकिन वे एक लंबी अवधि के संकट के लिए अपर्याप्त हैं। खासकर जब इसकी तुलना अन्य प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं की स्ट्रेटेजिक रिजर्व कैपेसिटी से की जाती है। होर्मुज को बायपास (bypass) करने के लिए सीमित वैकल्पिक इंफ्रास्ट्रक्चर (infrastructure) का मतलब है कि किसी भी बड़ी बाधा से उपलब्ध चैनल (channels) चरमरा जाएंगे, जिससे सप्लाई शॉक्स (supply shocks) बढ़ेंगे।
कीमतों में उतार-चढ़ाव से फिस्कल प्रेशर
वर्तमान जियोपॉलिटिकल तनावों के कारण तेल की कीमतें बढ़ रही हैं। यदि बाधाएं बढ़ती हैं या इंफ्रास्ट्रक्चर को नुकसान पहुंचता है, तो कीमतें $90-$120 प्रति बैरल तक बढ़ सकती हैं। 2026 के लिए वैश्विक ओवरसप्लाई (oversupply) की उम्मीदों के बावजूद, कीमतों का यह निरंतर स्तर भारत की फिस्कल स्टेबिलिटी (fiscal stability) के लिए लगातार खतरा पैदा करता है। देश का इंपोर्ट बिल वैश्विक मूल्य आंदोलनों के प्रति अत्यधिक संवेदनशील है, जिससे यह इन्फ्लेशनरी प्रेशर (inflationary pressures) और बढ़ते करंट अकाउंट डेफिसिट (current account deficit) का शिकार हो जाता है।
लिमिटेड इंपैक्ट एब्जॉर्प्शन
हालांकि विश्लेषक मानते हैं कि तेल बाजारों ने एक महत्वपूर्ण जियोपॉलिटिकल रिस्क प्रीमियम को शामिल कर लिया है, लेकिन वर्तमान मूल्य स्तर ऐतिहासिक संकटों जैसे इराक युद्ध की तुलना में अभी भी प्रबंधनीय हैं। लेकिन 2026 के लिए अनुमानित स्ट्रक्चरल ओवरसप्लाई (structural oversupply) कीमतों के लिए एक तल (floor) प्रदान कर सकती है, जिसका मतलब है कि डिमांड-साइड कमजोरियों (demand-side weaknesses) को सप्लाई-साइड रिस्क (supply-side risks) से छिपाया जा सकता है। अतीत में होर्मुज में बाधाओं का ऐतिहासिक संदर्भ महत्वपूर्ण मूल्य स्पाइक्स (price spikes) और आर्थिक व्यवधानों को दिखाता है, जो यहां तक कि अस्थायी नाकेबंदी के गहरे प्रभाव को दर्शाता है।
आगे का रास्ता: अनिश्चितता और तैयारी
विश्लेषकों का मानना है कि मध्य पूर्व में जियोपॉलिटिकल स्थिति के तरल (fluid) बने रहने के कारण तेल की कीमतों में लगातार उतार-चढ़ाव जारी रहेगा। हालांकि कुछ का मानना है कि बाजार ने वर्तमान जोखिमों को पहले ही भुना लिया है और यदि तनाव कम होता है तो कीमतें निचले स्तर पर लौट आएंगी, वहीं अन्य चेतावनी देते हैं कि यदि सप्लाई डिसरप्शन्स (disruptions) लंबे समय तक चलते हैं या इंफ्रास्ट्रक्चर को निशाना बनाया जाता है तो कीमतों में महत्वपूर्ण वृद्धि की संभावना है। अप्रैल 2026 में OPEC+ (ओपेक प्लस) द्वारा नियोजित आउटपुट वृद्धि (output increase) कुछ हद तक कीमतों को स्थिर कर सकती है, लेकिन समग्र सप्लाई-डिमांड संतुलन (supply-demand balance) क्षेत्रीय संघर्षों की अवधि और तीव्रता से काफी प्रभावित होगा। भारत की दीर्घकालिक एनर्जी सिक्योरिटी रणनीति में संभवतः इन लगातार वैश्विक जोखिमों को कम करने के लिए रिजर्व विस्तार, इंपोर्ट डाइवर्सिफिकेशन (import diversification) और लॉजिस्टिकल रेजिलिएंस (logistical resilience) को बढ़ाना जारी रहेगा।