ऊर्जा की दोहरी चाल: कोयले का चरम और नेट-ज़ीरो की राह
सरकारी थिंक-टैंक NITI Aayog की एक अहम रिपोर्ट भारत के ऊर्जा भविष्य की एक बड़ी तस्वीर पेश करती है। इसमें अनुमान लगाया गया है कि देश का कोयला (Coal) इस्तेमाल 2050 तक रिकॉर्ड 2.62 अरब मीट्रिक टन के शिखर पर पहुंच जाएगा, जो मौजूदा 1.26 अरब टन की खपत से दोगुना से भी ज़्यादा है। यह तब होगा जब हम अपने महत्वाकांक्षी नेट-ज़ीरो (Net-Zero) उत्सर्जन लक्ष्य, जो 2070 तक हासिल करना है, की ओर बढ़ रहे होंगे। यह रिपोर्ट बताती है कि तात्कालिक ऊर्जा ज़रूरतों और लंबी अवधि के जलवायु लक्ष्यों के बीच संतुलन बनाना कितना मुश्किल है।
कोयले की ज़रूरत और रिन्यूएबल की दौड़
रिपोर्ट के अनुसार, अगर भारत अपनी वर्तमान नीतियों पर चलता है, तो 2070 तक भी औद्योगिक मांग 1.80 अरब टन कोयले की बनी रहेगी। यह कोयले की निरंतर, हालांकि घटती हुई, भूमिका को दर्शाता है, जो औद्योगिक विकास और पावर ग्रिड की स्थिरता को बनाए रखने के लिए ज़रूरी है, खासकर जब विकल्पों की तकनीक और लागतें अभी भी एक चुनौती हैं।
हालांकि, नेट-ज़ीरो (Net-Zero) परिदृश्य में तस्वीर काफी अलग है। इसमें कोयले की खपत 2050 में 1.83 अरब टन के शिखर पर पहुंचने के बाद 2070 तक घटकर महज़ 161 मिलियन टन रह जाने का अनुमान है। इस रास्ते के लिए स्वच्छ ऊर्जा स्रोतों की ओर एक बड़े बदलाव की ज़रूरत होगी। फिलहाल, भारत की लगभग 75% बिजली कोयले से बनती है, और सरकार 2034-35 तक कोयला पावर क्षमता को 307 GW तक बढ़ाने की योजना बना रही है। इसकी तुलना में, रिन्यूएबल एनर्जी (Renewable Energy) की ग्रोथ तेज़ी से हो रही है; 2030 तक 500 GW गैर-जीवाश्म ईंधन क्षमता का लक्ष्य है और जून 2025 तक कुल स्थापित क्षमता का लगभग 49% (लगभग 235.7 GW) रिन्यूएबल ऊर्जा से आ रहा है।
इंफ्रास्ट्रक्चर और टेक्नोलॉजी पर बड़ा दांव
नेट-ज़ीरो (Net-Zero) लक्ष्य को हासिल करने के लिए कई महत्वपूर्ण टेक्नोलॉजी और इंफ्रास्ट्रक्चर में भारी निवेश की ज़रूरत होगी। रिपोर्ट बैटरी स्टोरेज सिस्टम (Battery Storage Systems) की बड़े पैमाने पर तैनाती पर ज़ोर देती है, जिसकी हालिया टैरिफ लागतें करीब ₹2.1 प्रति kWh पर आ गई हैं। सरकार इन प्रणालियों को बढ़ावा देने के लिए सक्रिय रूप से योजनाएं चला रही है। ग्रिड विस्तार (Grid Expansion) भी एक महत्वपूर्ण हिस्सा है, जिसके लिए 2032 तक नई ट्रांसमिशन लाइनों के निर्माण पर अनुमानित $107 बिलियन खर्च करने होंगे ताकि बढ़ती स्वच्छ ऊर्जा क्षमता को समाहित किया जा सके। स्टील और सीमेंट जैसे 'हार्ड-टू-अबेट' (Hard-to-abate) सेक्टर्स कार्बन कैप्चर, यूटिलाइजेशन और स्टोरेज (CCUS) जैसी टेक्नोलॉजी पर निर्भर रहेंगे, हालांकि अभी CCUS में निवेश शुरुआती दौर में है और लागतें ज़्यादा हैं। स्वच्छ टेक्नोलॉजी की कुल लागत में भी काफी कमी आनी चाहिए।
चुनौतियाँ और फाइनेंशियल रिस्क
India के नेट-ज़ीरो (Net-Zero) लक्ष्य के रास्ते में कई बड़ी फाइनेंशियल और निष्पादन संबंधी बाधाएं हैं। इस परिवर्तन के लिए कुल मिलाकर लगभग $22.7 ट्रिलियन के निवेश की ज़रूरत होगी, जिसमें से कम से कम $6 ट्रिलियन बाहरी स्रोतों से आने चाहिए। अकेले पावर सेक्टर को कुल ज़रूरत का आधे से ज़्यादा हिस्सा चाहिए, जो इकोनॉमी-वाइड इलेक्ट्रिफिकेशन और लो-कार्बन उत्पादन विस्तार में इसकी केंद्रीय भूमिका को रेखांकित करता है। सालाना निवेश की ज़रूरत लगभग $500 बिलियन रहने का अनुमान है, जो मौजूदा स्वच्छ ऊर्जा निवेश से काफी ज़्यादा है।
नेट-ज़ीरो (Net-Zero) के लिए आवश्यक कई टेक्नोलॉजी अभी तक व्यावसायिक रूप से परिपक्व नहीं हुई हैं, जबकि मौजूदा लो-कार्बन टेक्नोलॉजी में अक्सर भारी शुरुआती पूंजी निवेश की आवश्यकता होती है। लॉन्ग-टर्म लो-कार्बन डेवलपमेंट स्ट्रैटेजी (LT-LEDS) में मौजूदा पहलों से परे नेट-ज़ीरो (Net-Zero) हासिल करने के लिए पर्याप्त स्पष्ट नीतिगत मार्गदर्शन का अभाव है, जिससे विश्लेषक लक्ष्य के कार्यान्वयन को "खराब" (Poor) रेटिंग देते हैं, क्योंकि इसमें पारदर्शिता और नीतिगत रास्ते अपर्याप्त हैं। इस रणनीति में "नाजुक संतुलन" (Delicate Balancing Act) बनाने की ज़रूरत है। रिन्यूएबल के साथ इंटीग्रेशन की चुनौतियाँ, जैसे कि अतिरिक्त स्वच्छ ऊर्जा का प्रबंधन, संचालन संबंधी जटिलताएँ और बिजली उत्पादन में कमी ला सकती हैं। इसके अलावा, ग्रिड-स्केल रिन्यूएबल के लिए India की कॉस्ट ऑफ कैपिटल (Cost of Capital) उन्नत अर्थव्यवस्थाओं की तुलना में ज़्यादा बनी हुई है। महत्वाकांक्षी रिन्यूएबल लक्ष्यों के बावजूद, वर्तमान रुझानों के तहत 2050 तक India के प्राथमिक ऊर्जा मिश्रण (Primary Energy Mix) का एक महत्वपूर्ण हिस्सा, संभावित रूप से 40% से ज़्यादा, कोयला बना रहेगा। यह निरंतर निर्भरता नेट-ज़ीरो (Net-Zero) लक्ष्य के साथ एक बड़ा विरोधाभास पेश करती है।