भारत को अगले 20 सालों तक एनर्जी इंपोर्ट पर भारी खर्च करना पड़ सकता है। Kotak Institutional Equities की एक रिपोर्ट के अनुसार, 2050 के दशक तक देश का एनर्जी इंपोर्ट बिल सालाना **$300 बिलियन** (लगभग ₹25 लाख करोड़) तक पहुंच सकता है। यह तब है जब देश ग्रीन एनर्जी की ओर तेजी से बढ़ रहा है।
क्या है मामला?
Kotak Institutional Equities की हालिया रिपोर्ट बताती है कि भारत की एनर्जी की कुल मांग वित्त वर्ष 2026 में 40 एक्सजोल्स से बढ़कर वित्त वर्ष 2056 तक 89 एक्सजोल्स हो जाने की उम्मीद है। वहीं, इस समय सीमा तक घरेलू उत्पादन सिर्फ 65 एक्सजोल्स तक ही पहुंच पाएगा। ऐसे में, अगले 20 साल या उससे अधिक समय तक भारत को ऊर्जा के लिए आयात पर निर्भर रहना पड़ेगा।
इकोनॉमी पर असर?
ऊर्जा आयात बिल एक अहम आर्थिक पैमाना है। भारत कच्चे तेल का एक बड़ा आयातक है, और आयात बिल बढ़ने का सीधा असर देश के करंट अकाउंट डेफिसिट (CAD) पर पड़ता है, जो दुनिया के साथ देश के व्यापार संतुलन को दर्शाता है। जब भारत ईंधन पर ज्यादा खर्च करता है, तो रुपये पर दबाव बढ़ सकता है और महंगाई भी बढ़ सकती है। रिपोर्ट कहती है कि भले ही रिन्यूएबल एनर्जी (Renewable Energy) का उत्पादन बढ़ेगा, लेकिन भारत की विकासशील अर्थव्यवस्था की विशालता का मतलब है कि अगले कई सालों तक जीवाश्म ईंधन (Fossil Fuels) की खपत बढ़ती रहेगी।
इलेक्ट्रिक व्हीकल (EV) का सच
इलेक्ट्रिक व्हीकल (EVs) को लेकर भले ही उत्साह हो, लेकिन रिपोर्ट में कहा गया है कि पेट्रोल और डीजल पर चलने वाली गाड़ियां (Internal Combustion Engines) भारतीय सड़कों पर लंबे समय तक बनी रहेंगी। मौजूदा पारंपरिक वाहनों का बेड़ा अगले दशक तक और बढ़ने की उम्मीद है। नतीजतन, गैसोलीन और डीजल की मांग वित्त वर्ष 2046 तक बढ़ने का अनुमान है। इसका मतलब है कि सड़कों पर ज्यादा EVs आने के बावजूद, ईंधन की कुल खपत तुरंत कम नहीं होगी।
ग्रीन एनर्जी ट्रांजीशन में रुकावटें
निवेशकों को पावर प्लांट बनाने और उस बिजली को देश भर में पहुंचाने के बीच के अंतर को समझना होगा। सोलर (Solar) और विंड (Wind) प्रोजेक्ट्स जल्दी बन जाते हैं, जिनमें अक्सर 12 से 18 महीने लगते हैं। लेकिन, इस बिजली को शहरों तक पहुंचाने वाले ट्रांसमिशन इंफ्रास्ट्रक्चर (Transmission Infrastructure) को बनाने में तीन से पांच साल लग सकते हैं। यह देरी, ग्रिड कंजेशन (Grid Congestion), जमीन अधिग्रहण की दिक्कतें और एनर्जी स्टोरेज (Energy Storage) की भारी कमी ग्रीन एनर्जी को अपनाने में बड़ी बाधाएं हैं। स्टोरेज की कमी का मतलब है कि भारत दिन में उत्पन्न हुई बिजली को रात में इस्तेमाल के लिए स्टोर नहीं कर पा रहा है।
मैन्युफैक्चरिंग और सप्लाई चेन का जोखिम
आयात पर निर्भरता कम करने के लिए सोलर कंपोनेंट्स और बैटरी पार्ट्स के घरेलू उत्पादन को बढ़ावा देने के प्रयास जारी हैं। अनुमान है कि वित्त वर्ष 2028 तक भारत सोलर सेल और मॉड्यूल के लिए सरप्लस कैपेसिटी (Surplus Capacity) विकसित कर सकता है। हालांकि, बैटरी के सप्लाई चेन में एक बड़ा जोखिम बना हुआ है। लिथियम और अन्य खनिजों जैसे कच्चे माल की आपूर्ति एक चुनौती बनी हुई है, क्योंकि भारत इन महत्वपूर्ण घटकों के लिए काफी हद तक आयात पर निर्भर है। यह निर्भरता उत्पादन लागत को अस्थिर रख सकती है।
निवेशकों को क्या देखना चाहिए?
निवेशकों को ट्रांसमिशन इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स की प्रगति पर नजर रखनी चाहिए, क्योंकि रिन्यूएबल एनर्जी कंपनियों के लिए ग्रिड विस्तार की गति महत्वपूर्ण है। अन्य मुख्य क्षेत्र घरेलू बैटरी निर्माण सुविधाओं का रोलआउट और एनर्जी स्टोरेज प्रोजेक्ट्स की समय-सीमा हैं। इन पर नजर रखकर यह समझा जा सकता है कि भारत अपनी बढ़ती ऊर्जा मांग और घरेलू आपूर्ति के बीच के अंतर को सफलतापूर्वक कम कर पाएगा या नहीं।
