विविधीकरण की दोहरी तलवार:
ऊर्जा स्रोतों में विविधता लाने और महत्वपूर्ण खनिजों को सुरक्षित करने की भारत की रणनीतिक ज़रूरत, वैश्विक मांग और भू-राजनीतिक बदलावों के बीच, नए जोखिम भी तैयार कर रही है। Tata Steel के CEO और मैनेजिंग डायरेक्टर T V Narendran ने बताया कि आपूर्ति श्रृंखलाओं (supply chains) को विस्तृत करने से आयात पर निर्भरता बढ़ती है और उनके सुचारू प्रवाह को सुनिश्चित करने के लिए ज़रूरी राजनीतिक सद्भावना (political goodwill) भी अहम हो जाती है। यह सलाह महामारी, रूस-यूक्रेन संघर्ष और पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव जैसी वैश्विक बाधाओं के बाद आई है। इन घटनाओं ने वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं को बुरी तरह प्रभावित किया है, कमोडिटी की कीमतों में भारी उतार-चढ़ाव देखा गया है और प्रमुख शिपिंग मार्गों को बाधित किया है। हालांकि ऊर्जा सुरक्षा और आर्थिक स्थिरता के लिए विविधीकरण महत्वपूर्ण है, यह जोखिमों को खत्म करने के बजाय उन्हें बदल देता है, जिसके लिए नई निर्भरताओं के प्रबंधन के लिए एक सक्रिय दृष्टिकोण अपनाना ज़रूरी है।
महत्वपूर्ण खनिज क्यों हैं अहम?
ऊर्जा परिवर्तन (energy transition), डिजिटलीकरण और AI इंफ्रास्ट्रक्चर की वजह से लिथियम, कोबाल्ट और दुर्लभ पृथ्वी धातुओं (rare earths) जैसे महत्वपूर्ण खनिजों की वैश्विक मांग तेजी से बढ़ रही है। ये खनिज सोलर पैनल, विंड टरबाइन, इलेक्ट्रिक वाहनों (EVs) और एडवांस्ड इलेक्ट्रॉनिक्स जैसी स्वच्छ ऊर्जा प्रौद्योगिकियों (clean energy technologies) के लिए महत्वपूर्ण हैं। हालांकि, इन सामग्रियों की आपूर्ति श्रृंखलाएं अत्यधिक केंद्रित (highly concentrated) और राजनीतिक रूप से नाजुक हैं। उदाहरण के लिए, चीन कई महत्वपूर्ण खनिजों के शोधन (refining) और प्रसंस्करण (processing) पर हावी है, जिससे वैश्विक बाजारों पर उसका महत्वपूर्ण प्रभाव है और आयात करने वाले देशों के लिए कमजोरियां पैदा होती हैं। इस एकाग्रता के कारण निर्यात नियंत्रण और बाजार में हेरफेर हुआ है, जिससे वैश्विक राजनीतिक प्रतिस्पर्धा बढ़ी है। अमेरिका, यूरोपीय संघ और जापान जैसे देश इस नियंत्रण को चुनौती देने और अधिक स्थिर आपूर्ति श्रृंखला बनाने के लिए सक्रिय रूप से साझेदारी की तलाश कर रहे हैं और नीतियां बना रहे हैं। भारत, 2025 की शुरुआत में लॉन्च किए गए अपने नेशनल क्रिटिकल मिनरल मिशन (National Critical Mineral Mission - NCMM) के माध्यम से, घरेलू अन्वेषण (exploration) को बढ़ावा देने, नियमों को सरल बनाने, विदेशों में खदानें खरीदने को प्रोत्साहित करने और रीसाइक्लिंग को बढ़ावा देने का लक्ष्य रखता है। इस मिशन का उद्देश्य दीर्घकालिक उपलब्धता सुनिश्चित करना और मूल्य श्रृंखलाओं को मजबूत करना है।
वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं में उभरते जोखिम:
भारत के ऊर्जा और खनिज विविधीकरण प्रयासों से अवसर तो मिलते हैं, लेकिन महत्वपूर्ण जोखिम बने हुए हैं। महत्वपूर्ण खनिज उत्पादन और प्रसंस्करण की एकाग्रता, विशेष रूप से चीन की प्रमुख भूमिका, भारत को संभावित निर्यात प्रतिबंधों और राजनीतिक लाभ के प्रति संवेदनशील बनाती है। इसके अलावा, "संसाधन राष्ट्रवाद" (resource nationalism) के बढ़ने का मतलब है कि देश तेजी से अपनी जरूरतों को प्राथमिकता दे रहे हैं, जिससे बाहरी पहुंच सीमित हो सकती है। कुछ नवीकरणीय ऊर्जा खनिजों के लिए भारत की 100% आयात निर्भरता इस नाजुक स्थिति को उजागर करती है। बढ़ती भू-राजनीतिक अस्थिरता, जैसे कि चल रहा पश्चिम एशिया संघर्ष, माल ढुलाई (freight) और बीमा दरों को बढ़ाकर, और एलपीजी व एलएनजी जैसे ईंधन की आपूर्ति को प्रतिबंधित करके, सीधे स्टील उद्योग को प्रभावित करती है, जिससे परिचालन लागत (running costs) बढ़ जाती है। विश्लेषक रिपोर्टों (analyst reports) से पता चलता है कि 2035 तक तांबा (copper) और लिथियम जैसे प्रमुख खनिजों की मांग घोषित परियोजनाओं (announced projects) की नियोजित आपूर्ति से अधिक हो सकती है, जिससे कमी और उच्च कीमतों की आशंका है। भारत के नेशनल क्रिटिकल मिनरल मिशन (NCMM) की सफलता न केवल घरेलू प्रयासों पर निर्भर करती है, बल्कि अंतरराष्ट्रीय संबंधों को प्रबंधित करने, विश्वसनीय विदेशी साझेदारों को सुरक्षित करने और किसी एक देश या क्षेत्र पर बहुत अधिक निर्भरता से बचने के लिए मजबूत प्रसंस्करण (processing) और रीसाइक्लिंग क्षमताओं को विकसित करने पर भी निर्भर करती है।
भारत की रणनीति और भविष्य का नज़रिया:
जैसे-जैसे वैश्विक ऊर्जा प्रणालियां महत्वपूर्ण अस्थिरता का सामना कर रही हैं और स्वच्छ ऊर्जा परिवर्तन (clean energy transition) की तत्काल आवश्यकता है, महत्वपूर्ण खनिजों को राष्ट्रीय सुरक्षा और आर्थिक मजबूती के लिए मौलिक माना जाता है। इंटरनेशनल एनर्जी एजेंसी (International Energy Agency - IEA) की रिपोर्टें बताती हैं कि जहां वर्तमान नीतियों के तहत कुछ खनिजों की समग्र आपूर्ति और मांग संतुलित हो सकती है, वहीं लिथियम और तांबे जैसे विशिष्ट महत्वपूर्ण खनिज 2035 तक कमी का सामना कर सकते हैं। वैश्विक रणनीतियों, जिसमें भारत का NCMM भी शामिल है, विविध आपूर्ति स्रोतों और मजबूत घरेलू प्रसंस्करण के माध्यम से लचीलापन (resilience) बनाने पर केंद्रित हैं। दृष्टिकोण केवल आपूर्ति बढ़ाने से हटकर मांग-पक्ष नीतियों (demand-side policies) को भी शामिल करने की ओर बढ़ रहा है, जैसे कि इलेक्ट्रिक वाहन (EV) अपनाने को बढ़ावा देना, जो खनिज की मांग और परियोजना की लाभप्रदता को प्रभावित करता है। भारत का विश्वसनीय वैश्विक भागीदार बनने का लक्ष्य इन नए जोखिमों को स्थिर, किफायती और सुरक्षित महत्वपूर्ण संसाधनों तक पहुंच सुनिश्चित करके नेविगेट करने की उसकी क्षमता पर निर्भर करता है, जिससे वैश्विक ऊर्जा और प्रौद्योगिकी आपूर्ति श्रृंखलाओं में उसकी स्थिति सुरक्षित हो सके।