वित्तीय वर्ष 2026 तक भारत की डिस्ट्रीब्यूटेड सोलर पावर कैपेसिटी 31.5 GW तक पहुंच गई है, जो वित्तीय वर्ष 2018 के 1.8 GW से काफी बड़ा उछाल है। सरकारी योजनाएं जैसे 'पीएम सूर्य घर' और 'पीएम कुसुम' इस बढ़ोतरी की मुख्य वजह हैं, लेकिन रेगुलेटरी अप्रूवल में देरी और फाइनेंसिंग की दिक्कतें अभी भी बड़ी चुनौतियां बनी हुई हैं।
भारत में सोलर पावर का बढ़ा जलवा
भारत ने रिन्यूएबल एनर्जी के क्षेत्र में एक बड़ी उपलब्धि हासिल की है। वित्तीय वर्ष 2026 के अंत तक, देश की डिस्ट्रीब्यूटेड सोलर कैपेसिटी बढ़कर 31.5 गीगावाट (GW) हो गई है। यह आंकड़ा वित्तीय वर्ष 2018 में महज़ 1.8 GW था, यानी एक बड़ी छलांग। इस शानदार ग्रोथ का श्रेय मुख्यतः सरकारी पहलों को जाता है, जिनमें 'प्रधानमंत्री सूर्य घर मुफ्त बिजली योजना' और 'प्रधानमंत्री किसान ऊर्जा सुरक्षा एवं उत्थान महाभियान' (पीएम-कुसुम) प्रमुख हैं।
घर-घर और खेत-खेत तक सोलर
रूफटॉप सोलर इंस्टॉलेशन इस बढ़ोतरी का मुख्य इंजन रहा है। वित्तीय वर्ष 2018 में जहां यह क्षमता 1.1 GW थी, वहीं वित्तीय वर्ष 2026 तक यह 25.7 GW तक पहुंच गई। वहीं, कृषि क्षेत्र में भी पीएम-कुसुम के तहत सोलर पंपों की संख्या तेजी से बढ़ी है, जो 0.7 GW से बढ़कर 5.8 GW हो गई है। ये दोनों क्षेत्र ग्रिड पावर पर निर्भरता कम करने और किसानों व घरों की बिजली लागत घटाने में अहम भूमिका निभा रहे हैं।
धीमी चाल और फाइनेंसिंग की दिक्कतें
इन बड़ी उपलब्धियों के बावजूद, यह सेक्टर कुछ गंभीर समस्याओं से जूझ रहा है जिन पर निवेशकों को गौर करना चाहिए। इंस्टीट्यूट फॉर एनर्जी इकोनॉमिक्स एंड फाइनेंशियल एनालिसिस (IEEFA) की एक रिपोर्ट बताती है कि भारत ने सोलर एप्लीकेशन के लिए बेहतरीन डिजिटल प्लेटफॉर्म तो बना लिए हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर काम अक्सर धीमा होता है। नियमों के अनुसार अप्रूवल 15 से 30 दिनों में मिल जाना चाहिए, पर असल में इसमें काफी ज्यादा समय लगता है।
इसके अलावा, अलग-अलग राज्यों में स्मार्ट मीटरों का एक जैसा न लगना नेटवर्क की विजिबिलिटी को प्रभावित करता है, जो ग्रिड मैनेजमेंट के लिए जरूरी है। फाइनेंसिंग भी एक बड़ा मुद्दा है। सोलर प्रोजेक्ट्स में भारी पूंजी की जरूरत होती है, और इसके लिए पब्लिक और प्राइवेट फंड के मिले-जुले 'ब्लेंडेड फाइनेंस' तक आसान पहुंच होना जरूरी है। वहीं, छोटे जलविद्युत और बायोएनर्जी जैसे अन्य डिस्ट्रीब्यूटेड एनर्जी सोर्स की ग्रोथ सोलर जितनी तेज नहीं रही है, जो दर्शाता है कि क्लीन एनर्जी के सभी श्रेणियों में एक जैसी प्रगति नहीं हो रही है।
आगे क्या देखें?
सोलर इकोसिस्टम से जुड़ी कंपनियों, जैसे पैनल निर्माता, इंस्टॉलेशन सर्विस प्रोवाइडर या इन्वर्टर टेक्नोलॉजी कंपनियों में निवेश करने वाले निवेशकों को अब पॉलिसी की स्थिरता और काम की रफ़्तार पर ध्यान देना होगा। राज्यों में नेट-मीटरिंग नियमों का मानकीकरण, स्मार्ट मीटर लगने की तेजी और सब्सिडी स्ट्रक्चर में संभावित बदलावों पर नज़र रखना अहम होगा। इन क्षेत्रों में सुधार से ही देश की 637 GW की अनटैप्ड रूफटॉप सोलर क्षमता का पूरा फायदा उठाया जा सकेगा। इसके अलावा, डोमेस्टिक मैन्युफैक्चरिंग की रफ़्तार भी एक अहम फैक्टर होगी, क्योंकि यही तय करेगा कि इंडस्ट्री इंपोर्टेड कंपोनेंट्स पर अपनी निर्भरता कितनी जल्दी कम कर पाती है।
