क्या है सरकार का प्लान?
कोयला मंत्री जी किशन रेड्डी ने बताया है कि साल 2029-30 तक कोयला उत्पादन को 1.5 बिलियन टन तक ले जाने का लक्ष्य रखा गया है। इसके लिए सालाना 6-7% की ग्रोथ जरूरी होगी। इस कदम से न सिर्फ देश की ऊर्जा सुरक्षा मजबूत होगी, बल्कि बिजली क्षेत्र में कोयला आयात में भी 30% तक की कमी लाने की उम्मीद है। मौजूदा समय में, 2024-25 के लिए कोयला उत्पादन लगभग 1,047.69 मिलियन टन रहा है। अनुमान है कि भारत में कोयले की डिमांड 2040 के आसपास अपने चरम पर पहुंच सकती है, जो दिखाता है कि आने वाले वक्त में भी यह कमोडिटी ऊर्जा मिश्रण का एक अहम हिस्सा बनी रहेगी। देश के कुल ऊर्जा मिश्रण में कोयले की हिस्सेदारी 55% है और बिजली उत्पादन में इसका योगदान 74% से अधिक है।
क्यों हो रहा है प्रोडक्शन बढ़ाने पर जोर?
देश के आर्थिक विकास और ऊर्जा सुरक्षा को सहारा देने के लिए कोयला उत्पादन बढ़ाना एक बड़ा कदम है। यह ट्रेंड एशिया में, खासकर चीन और भारत जैसे देशों में, जहां कोयले की डिमांड और प्रोडक्शन दोनों ज्यादा है, देखने को मिल रहा है। भारत का कोयला उत्पादन पिछले कुछ समय में तेजी से बढ़ा है, 2024 में यह 1,082 MT के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंचा और फाइनेंशियल ईयर 2024-25 में एक बिलियन टन का आंकड़ा पार किया। सरकारी पहलों और बेहतर टेक्नोलॉजी के इस्तेमाल से प्रोडक्शन एफिशिएंसी बढ़ी है। इंटरनेशनल एनर्जी एजेंसी (IEA) का अनुमान है कि 2030 तक भारत की कुल कोयले की डिमांड 17% बढ़ सकती है, भले ही बिजली उत्पादन में इसकी हिस्सेदारी घटकर 60% रह जाए (जो अभी 70% से ज्यादा है)। स्टील और सीमेंट जैसे उद्योगों की बढ़ती मांग के चलते कोयले का महत्व बना हुआ है।
चुनौतियां: रिन्यूएबल्स और जमीन का मसला
सरकार के प्रोडक्शन बढ़ाने के प्रयासों के बावजूद, कोयला सेक्टर को रिन्यूएबल एनर्जी (जैसे सोलर और विंड पावर) के तेजी से बढ़ते विस्तार से कड़ी चुनौती मिल रही है। दुनिया भर की तरह भारत में भी, रिन्यूएबल्स बिजली की मांग को पूरा करने में अहम भूमिका निभा रहे हैं, जिससे कोयले की मांग पर असर पड़ रहा है। 2025 की पहली छमाही में, रिन्यूएबल्स ने बिजली की मांग वृद्धि को पीछे छोड़ दिया। एनालिस्ट्स का मानना है कि 2030 तक बिजली उत्पादन में कोयले की हिस्सेदारी घटकर करीब 60% रह जाएगी। वहीं, कुछ रिपोर्ट्स में कहा गया है कि 2025 में भारत में कोयले से बिजली उत्पादन 3% घटा है। इसके अलावा, जब उथली खदानों का कोयला खत्म हो जाता है, तो 300 मीटर से अधिक गहराई से कोयला निकालना तकनीकी और आर्थिक रूप से काफी मुश्किल हो जाता है।
कानूनी अड़चनें और अंतर्राष्ट्रीय दबाव
भारत की कोयला उत्पादन योजनाओं को जमीन अधिग्रहण की जटिल और अक्सर विवादास्पद प्रक्रियाओं से भी बाधा पहुंच रही है। 1957 का कोल बेयरिंग एरियाज (एक्विजिशन एंड डेवलपमेंट) एक्ट (CBA Act) सरकार को व्यापक अधिकार देता है, लेकिन इसमें प्रभावित समुदायों, खासकर आदिवासी लोगों से परामर्श और सहमति लेने का अभाव देखा गया है, जो अंतरराष्ट्रीय मानकों के विपरीत है। इस एक्ट की आलोचना की जाती है कि इसमें 2013 के राइट टू फेयर कंपनसेशन एंड ट्रांसपेरेंसी इन लैंड एक्विजिशन, रिहैबिलिटेशन एंड रीसेटलमेंट एक्ट (LARR) जैसे सामाजिक और पर्यावरणीय सुरक्षा उपायों की कमी है। अपर्याप्त मुआवजा, जमीन मालिकों का विरोध और जमीन के रिकॉर्ड को लेकर विवाद जैसी समस्याएं सामने आई हैं। कोयला इंडिया की खदानों के लिए जमीन अधिग्रहण में मानवाधिकारों के उल्लंघन और उचित सावधानी न बरतने के आरोप भी लगे हैं। सरकार की कोयला उत्पादन बढ़ाने और साथ ही रिन्यूएबल एनर्जी के बड़े लक्ष्य रखने की दोहरी रणनीति में एक अंतर्निहित तनाव है। जहां ग्रिड की स्थिरता और औद्योगिक जरूरतों के लिए कोयला महत्वपूर्ण है, वहीं रिन्यूएबल एनर्जी की लागत कम होने के कारण इसकी लंबी अवधि की आर्थिक व्यवहार्यता पर सवाल उठ रहे हैं। इसके अलावा, दुनिया भर में डीकार्बोनाइजेशन पर जोर दिया जा रहा है, जिससे भारत का कोयले पर लगातार निर्भर रहना अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर चिंता का विषय बन रहा है।
भविष्य की राह: मांग और बदलाव के बीच संतुलन
आगे चलकर, भारत का कोयला सेक्टर एक जटिल रास्ते पर चल रहा है। घरेलू उत्पादन बढ़ने की उम्मीद है, लेकिन इस वृद्धि की गति और स्थिरता कोयले और रिन्यूएबल्स के बीच बदलते समीकरणों पर निर्भर करेगी। अनुमान है कि 2030 और उसके बाद भी कोयला भारत के ऊर्जा मिश्रण का एक बड़ा हिस्सा बना रहेगा, लेकिन बिजली उत्पादन में इसका प्रतिशत कम हो सकता है। भारत के महत्वाकांक्षी रिन्यूएबल एनर्जी लक्ष्यों की सफलता और भविष्य में तेजी से डीकार्बोनाइजेशन की ओर बढ़ने वाली संभावित नीतिगत बदलाव, कोयला सेक्टर के दीर्घकालिक भविष्य को तय करेंगे। IEA का सुझाव है कि भारत की वर्तमान योजनाओं से 2030 तक बिजली उत्पादन में रिन्यूएबल्स की हिस्सेदारी 42% तक पहुंच सकती है। एनालिस्ट्स का कहना है कि ऊर्जा परिवर्तन (energy transition) के दौरान ग्रिड की स्थिरता में कोयला सहायक भूमिका निभा सकता है, लेकिन बढ़ती रिन्यूएबल क्षमता को देखते हुए इसका विस्तार अब अनावश्यक होता जा रहा है।