भारत ने 2030 तक **100 मिलियन टन** कोल गैसीफिकेशन क्षमता हासिल करने का लक्ष्य रखा है। सरकार इसके लिए बड़े इंसेंटिव दे रही है, लेकिन स्टील कंपनियां अपनी बैलेंस शीट बचाने के लिए अलग-अलग रास्ते अपना रही हैं।
भारत सरकार देश को इंपोर्टेड फ्यूल पर निर्भरता कम करने के लिए 2030 तक 100 मिलियन टन कोल गैसीफिकेशन कैपेसिटी बनाने का टारगेट लेकर चल रही है। इसके लिए सरकार भारी फंड और इंसेंटिव भी दे रही है, लेकिन स्टील इंडस्ट्री इस पर एक राय नहीं है कि क्या ये निवेश लॉन्ग-टर्म में फायदे का सौदा होगा या सिर्फ कर्ज का बोझ बढ़ाएगा।
कंपनियों की अलग-अलग रणनीति
स्टील सेक्टर की बड़ी कंपनियों ने इस तकनीक को लेकर अपने-अपने रास्ते चुन लिए हैं। Jindal Steel and Power ने एक इंटीग्रेटेड अप्रोच अपनाते हुए अंगुल प्लांट में गैसीफिकेशन का इस्तेमाल शुरू किया है। कंपनी अपनी खुद की गैस बनाकर कोकिंग कोल के महंगे इंपोर्ट को कम करने की कोशिश कर रही है, ताकि ग्लोबल मार्केट की कीमतों में उतार-चढ़ाव का असर कम हो।
वहीं, Tata Steel जैसी दिग्गज कंपनियां फिलहाल खुद गैसीफिकेशन प्लांट लगाने से बच रही हैं। उनकी रणनीति प्लांट के मालिक बनने के बजाय गैस खरीदने वाले (customer) की बनी रहने की है। इनका मानना है कि गैसीफिकेशन प्लांट लगाने में भारी कैपिटल की जरूरत होती है और कंपनी अपनी बैलेंस शीट को सुरक्षित रखते हुए मुख्य स्टील बिजनेस पर फोकस करना चाहती है।
इकोनॉमिक और फाइनेंशियल पेंच
इन्वेस्टर्स के लिए यह पूरा मामला कैपिटल एलोकेशन और कर्ज प्रबंधन का है। हालांकि, जानकारों का दावा है कि इनलैंड प्लांट में कच्चे माल की लागत में 15% तक की बचत संभव है, लेकिन गैसीफिकेशन प्लांट को खड़ा करना और उसे चलाना काफी महंगा है। अगर यह लागत फ्यूल बचत से ज्यादा हो गई, तो कंपनियों के प्रॉफिट मार्जिन पर सीधा असर पड़ेगा।
एनवायरनमेंटल दबाव और भविष्य
यूरोपीय संघ जैसे बाजारों में बढ़ते कार्बन टैक्स के दबाव के कारण भी कंपनियां क्लीन प्रोडक्शन की ओर देख रही हैं। कोल गैसीफिकेशन को कार्बन कैप्चर टेक्नोलॉजी के साथ जोड़ना एक बेहतर कदम माना जा रहा है, लेकिन इससे कुल लागत (Cost of ownership) और बढ़ जाती है। निवेशकों को यह नजर रखनी होगी कि कौन सी कंपनियां इस महंगी तकनीक के साथ कर्ज का जोखिम मैनेज कर पाती हैं, या फिर 'एंड-यूजर' वाली स्ट्रैटेजी ही अंत में ज्यादा सफल साबित होती है।
