'भारी भरकम' बजट और 'अटके' प्रोजेक्ट्स
सरकार ने India's coal gasification इनिशिएटिव (initiatives) के लिए बजट में भारी बढ़ोतरी की है। साल 2026-27 के लिए ₹3,525 करोड़ का फंड आवंटित किया गया है, जो कि पिछली आवंटन राशि ₹285 करोड़ (2025-26 के रिवाइज्ड अनुमान) से काफी ज्यादा है। लेकिन, यह पैसा एक ऐसे समय में आ रहा है जब प्रोग्राम की अपनी स्ट्रक्चरल (structural) बाधाएं और टेक्नोलॉजी (technology) की इनकम्पैटिबिलिटी (incompatibility) इसकी असरदार परफॉर्मेंस पर सवाल उठा रही हैं। खासकर तब, जब वेस्ट एशिया (West Asia) में बढ़ते जिओपॉलिटिकल टेंशन (geopolitical tensions) के कारण ग्लोबल एनर्जी प्राइसेस (global energy prices) आसमान छू रहे हैं और भारत की इंपोर्ट (import) पर निर्भरता को उजागर कर रहे हैं। रिपोर्ट्स के मुताबिक, साल 2025-26 के लिए आवंटित ₹300 करोड़ में से 90% से ज्यादा पैसा 2026 की शुरुआत तक भी खर्च नहीं हुआ था। यह दिखाता है कि असल समस्या पैसों की कमी नहीं, बल्कि प्रोजेक्ट एग्जीक्यूशन (project execution) और टेक्नोलॉजी (technology) की तैयारी में गहरी खामियां हैं। 2020 में शुरू हुए इस प्रोग्राम के लिए ये देरी, भारत के एनर्जी बास्केट (energy basket) को डाइवर्सिफाई (diversify) करने की अर्जेंसी (urgency) को और बढ़ा देती है। मार्च 2026 तक क्रूड ऑयल (crude oil) की कीमतें लगभग $113 प्रति बैरल तक पहुंच गई थीं, जो इस देरी को और भी गंभीर बनाती है।
सिस्टम की सुस्ती और टेक्नोलॉजी का खेल
भारत में बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स (infrastructure projects) में लंबा समय लगना आम बात है, और कोल गैसिफिकेशन मिशन भी इसका अपवाद नहीं है। कोल इंडिया लिमिटेड (Coal India Limited) को शामिल करके 2030 तक 100 MT गैसिफिकेशन का टारगेट तय करने वाले जॉइंट वेंचर्स (joint ventures) के लिए यूनियन कैबिनेट (Union Cabinet) की मंजूरी मिलने में दो साल से ज्यादा का समय लग गया। इसके अलावा, 2018 में शुरू हुआ एक फ्लैगशिप प्रोजेक्ट, तलचर फर्टिलाइजर्स प्लांट (Talcher Fertilizers Plant) का रिवाइवल, कई बार रीवाइज (revise) होने के बाद अब दिसंबर 2027 तक पूरा होने की उम्मीद है, जो कि ओरिजिनल डेडलाइन (original deadline) से काफी लेट है। इन की-प्रोजेक्ट्स (key projects) में लगातार हो रही देरी यह बताती है कि सिस्टम में कहीं बड़ी कमी है, जिसे सिर्फ पैसों से पूरा नहीं किया जा सकता। इस बीच, चीन जैसे देश सालाना करोड़ों टन कोयले का गैसिफिकेशन कर रहे हैं ताकि लिक्विड नेचुरल गैस (liquefied natural gas) इंपोर्ट पर अपनी निर्भरता कम कर सकें।
टेक्नोलॉजी का मिसमैच और आगे का रास्ता
एक और बड़ी बाधा NITI Aayog और एक्सपर्ट्स ने बताई है - भारत के स्वदेशी कोयले के साथ ग्लोबल गैसिफिकेशन टेक्नोलॉजी की इनकम्पैटिबिलिटी (incompatibility)। भारत के कोयले में अक्सर 30% से 45% तक राख (ash content) होती है, जिसके लिए खास प्री-प्रोसेसिंग (pre-processing) या खास टेक्नोलॉजी की जरूरत पड़ती है। हालांकि, फ्लूइडाइज्ड बेड गैसिफिकेशन (fluidized bed gasification) जैसी टेक्नोलॉजी को भारतीय कोयले के लिए ज्यादा सूटेबल माना गया है, लेकिन इसका बड़े पैमाने पर इस्तेमाल अभी भी एक चुनौती है। यह टेक्नोलॉजी का टकराव सीधे तौर पर प्रोजेक्ट्स की फिजिबिलिटी (viability) और एफिशिएंसी (efficiency) को प्रभावित कर रहा है, जिससे भारत के करीब 400 बिलियन टन कोयले के भंडार को वैल्यूएबल सिंथेसिस गैस (synthesis gas) और दूसरे प्रोडक्ट्स में बदलने में दिक्कत आ रही है। ओवरऑल, प्रोजेक्ट एग्जीक्यूशन में हो रही देरी, लंबी अप्रूवल साइकिल्स (approval cycles), पुअर बिजनेस मॉडल्स (business models) और इंपोर्टेड टेक्नोलॉजी पर निर्भरता इस मिशन के आगे बढ़ने में रुकावट बन रही हैं। एक्सपर्ट्स का मानना है कि इन समस्याओं को हल करने के लिए टेक्नोलॉजी एडॉप्शन (technology adaptation), रेगुलेटरी अप्रूवल (regulatory approvals) को आसान बनाना और प्राइवेट कैपिटल (private capital) को आकर्षित करना जरूरी है। तेज डिसिजन-मेकिंग (decision-making) और पॉलिसी क्लैरिटी (policy clarity) के साथ-साथ सरकारी बॉडीज, रिसर्च इंस्टीट्यूशंस (research institutions) और इंडस्ट्री प्लेयर्स (industry players) के बीच तेज सहयोग स्वदेशी टेक्नोलॉजी डेवलपमेंट (indigenous technology development) को बढ़ावा देने के लिए एसेंशियल (essential) है। इन एफर्ट्स (efforts) के बिना, 2030 का महत्वाकांक्षी लक्ष्य पूरा होने के बजाय एक ख्वाब बनकर रह जाएगा, और भारत की एनर्जी सिक्योरिटी (energy security) की कमजोरियां और बढ़ जाएंगी।
