लोकल कोयले पर फोकस, शुरू हुई टेस्टिंग
भारत अब बिजली उत्पादन के लिए इस्तेमाल होने वाले कोयले में घरेलू आपूर्ति बढ़ाने और विदेशी बाजारों से इम्पोर्ट (import) पर निर्भरता कम करने की कोशिश में है। इस रणनीति के तहत, उन पावर प्लांट्स (power plants) में डोमेस्टिक (domestic) कोयले को इंटीग्रेट (integrate) करने की पायलट योजना शुरू की गई है, जिन्हें मूल रूप से इम्पोर्टेड कोयले के लिए डिजाइन किया गया था। यह कदम एनर्जी सिक्योरिटी (energy security) को मजबूत करेगा, क्योंकि अंतरराष्ट्रीय बाजार अक्सर कीमतों में उतार-चढ़ाव और सप्लाई में रुकावटों का सामना करते हैं। वर्तमान में, यह टेस्टिंग 10 यूनिट्स में की जा रही है, जिनकी कुल क्षमता लगभग 18,000 MW है, ताकि इसकी ऑपरेशनल फिजिबिलिटी (operational feasibility) का आकलन किया जा सके। सरकार इस पहल को आगे बढ़ा रही है क्योंकि घरेलू कोयला आसानी से उपलब्ध है, जबकि इम्पोर्ट चैनल ज्यादा वोलेटाइल (volatile) हैं।
कोयले की क्वालिटी का बड़ा अंतर: बड़ी तकनीकी चुनौती
इस योजना के रास्ते में एक बड़ी चुनौती घरेलू और इम्पोर्टेड कोयले की क्वालिटी (quality) के बीच बड़ा अंतर है। भारतीय डोमेस्टिक थर्मल कोयले में आमतौर पर कैलोरी वैल्यू (calorific value) 3,500-4,000 kcal/kg के आसपास होती है और एश कंटेंट (ash content) 40% से ज्यादा होता है। इसके बिल्कुल विपरीत, इम्पोर्टेड थर्मल कोयले की कैलोरी वैल्यू 6,000 kcal/kg से ऊपर और एश कंटेंट 10% से कम होता है। क्वालिटी के ये अंतर सीधे तौर पर पावर प्लांट्स के परफॉरमेंस (performance) को प्रभावित करते हैं, जिससे एफिशिएंसी (efficiency), कम्बशन (combustion) और उपकरणों की घिसावट पर असर पड़ता है। पावर प्रोड्यूसर्स (power producers) का कहना है कि जो प्लांट्स लो-एश (low-ash) कोयले और खास पार्टिकल साइज (particle size) के लिए ऑप्टिमाइज (optimize) किए गए हैं, उनमें इस नए ब्लेंड (blend) को अपनाना मुश्किल हो रहा है। इन प्लांट्स को डोमेस्टिक कोयले के अनुकूल बनाने के लिए बड़े खर्च और कॉम्प्लेक्स इंजीनियरिंग (complex engineering) की जरूरत होगी।
स्टील और पावर के लिए इम्पोर्ट अभी भी जरूरी
घरेलू सोर्सिंग (sourcing) बढ़ाने के प्रयासों के बावजूद, भारत की इम्पोर्टेड कोयले पर निर्भरता बनी हुई है, खासकर महत्वपूर्ण इंडस्ट्रियल (industrial) जरूरतों के लिए। स्टील सेक्टर (steel sector) को अभी भी कोकिंग कोल (coking coal) की बड़ी मात्रा की जरूरत है, जिसकी घरेलू आपूर्ति पर्याप्त नहीं है। इसी तरह, कुछ इम्पोर्टेड कोयला-आधारित प्लांट्स के लिए हाई-ग्रेड थर्मल कोयला (high-grade thermal coal) एक जरूरी इम्पोर्ट है। फाइनेंशियल ईयर (Financial Year) 2026 में, भारत ने इन प्लांट्स में लगभग 39.2 मिलियन टन इम्पोर्टेड थर्मल कोयले का इस्तेमाल किया, जो पिछले साल से कम है, लेकिन फिर भी यह मात्रा काफी ज्यादा है। इम्पोर्ट की यह निरंतर जरूरत दर्शाती है कि भारत की एनर्जी स्ट्रेटेजी (energy strategy) डोमेस्टिक पोटेंशियल (potential) और स्पेशलाइज्ड ग्लोबल सोर्सिंग (specialized global sourcing) के बीच संतुलन बना रही है।
क्वालिटी के मुद्दे: ऑपरेशनल और एमिशन की चिंताएं
डोमेस्टिक कोयले की कम क्वालिटी के कारण इस पहल को बड़ी चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। 40% से अधिक एश कंटेंट (ash content) के कारण पार्टिकुलेट मैटर (particulate matter), सल्फर डाइऑक्साइड (SO2) और नाइट्रोजन ऑक्साइड (NOx) जैसे एमिशन (emissions) में बढ़ोतरी होती है। इससे बिजली उत्पादन पर्यावरण के लिए ज्यादा हानिकारक और महंगा हो जाता है। इम्पोर्टेड कोयले, जिसमें एश कम होता है, से आमतौर पर CO2 एमिशन (CO2 emissions) और पार्टिकुलेट जनरेशन (particulate generation) कम होता है, जिससे प्रति टन कोयले से ज्यादा बिजली मिलती है। इसके अलावा, सरकार द्वारा हाल ही में ज्यादातर कोयला-आधारित प्लांट्स के लिए SO2 एमिशन नॉर्म्स (emission norms) में ढील देना, ऊर्जा आपूर्ति को प्राथमिकता देने और तत्काल पर्यावरणीय लाभों से समझौता करने का संकेत देता है। हालांकि डोमेस्टिक कोयला उत्पादन में भारी बढ़ोतरी की उम्मीद है, जिसका लक्ष्य 2029-30 तक 1.5 बिलियन टन से अधिक हो जाएगा, लेकिन क्वालिटी के इस अंतर को सावधानी से मैनेज करने की जरूरत है। ऐतिहासिक रूप से, 2011 तक, इंडीजीनस (indigenous) कोयले के लिए डिजाइन किए गए बॉयलर्स (boilers) के लिए 10-15% तक इम्पोर्टेड कोयले की ब्लेंडिंग संभव मानी जाती थी; हालांकि, वर्तमान परीक्षण लगातार क्वालिटी अंतर के कारण कहीं ज्यादा जटिल वास्तविकता दर्शाते हैं।
आगे का रास्ता: ब्लेंडिंग चुनौतियों से निपटना
डोमेस्टिक कोयले के उपयोग के लिए सरकार के महत्वाकांक्षी लक्ष्य प्रोडक्शन ग्रोथ (production growth) के मजबूत पूर्वानुमानों से समर्थित हैं। हालांकि, वर्तमान ब्लेंडिंग परीक्षणों की सफलता भारत के निम्न-गुणवत्ता वाले डोमेस्टिक कोयला भंडार से उत्पन्न होने वाली तकनीकी चुनौतियों को दूर करने पर निर्भर करती है। इम्पोर्ट घटाने का लक्ष्य स्पष्ट होने के बावजूद, कोकिंग कोल (coking coal) और हाई-ग्रेड थर्मल कोल (high-grade thermal coal) की विशिष्ट जरूरतों का मतलब है कि ग्लोबल मार्केट्स (global markets) पर निर्भरता जारी रहेगी। बाजार विशेषज्ञ अनुमान लगाते हैं कि 2030 तक थर्मल कोयला इम्पोर्ट मार्केट (thermal coal import market) में भारत की हिस्सेदारी लगभग 20% पर स्थिर हो सकती है, जिसका अर्थ है कि पूरी तरह से इम्पोर्ट को बदलना संभव नहीं होगा। पॉलिसी को ऊर्जा सुरक्षा, पर्यावरण और ऑपरेशनल जरूरतों के बीच संतुलन बनाते हुए अनुकूलित होने की संभावना है, जिसके लिए प्लांट रेट्रोफिट्स (plant retrofits) या एडवांस्ड बेनिफिसिएशन टेक्नोलॉजीज (advanced beneficiation technologies) में निवेश की आवश्यकता हो सकती है।