भारत का Compressed Biogas (CBG) सेक्टर एक बड़ी मुसीबत में फंस गया है। प्लांट ऑपरेटर्स को प्लांट से निकलने वाली भारी मात्रा में जैविक खाद (Organic Manure) को बेचने में पसीने छूट रहे हैं, जिससे प्रोजेक्ट्स की फाइनेंशियल वायबिलिटी खतरे में है। अब तक लक्ष्य के मुकाबले केवल **217** प्लांट ही चालू हो पाए हैं।
खाद का अंबार और कम कमाई का गणित
सरकारी CBG इनिशिएटिव का पूरा मॉडल दो तरफा कमाई पर टिका है—एक गैस की बिक्री और दूसरा बाई-प्रोडक्ट के तौर पर निकलने वाली जैविक खाद। लेकिन हकीकत यह है कि 100 टन कचरा प्रोसेस करने वाले प्लांट से 40 टन ठोस खाद और 50,000 लीटर लिक्विड फर्टिलाइजर निकल रहा है, जिसके खरीदार नहीं मिल रहे हैं।
क्यों नहीं बिक रही खाद?
सबसे बड़ा विलेन है 'कीमत'। केमिकल फर्टिलाइजर पर मिलने वाली भारी सब्सिडी के सामने जैविक खाद टिक नहीं पा रही है। हालात तब और बिगड़ गए जब सरकार ने ₹1,500 प्रति टन की मार्केट डेवलपमेंट असिस्टेंस स्कीम को वापस ले लिया। इसके बाद फर्टिलाइजर कंपनियों ने भी इन प्लांट से दूरी बना ली है, जिससे सप्लाई चेन पूरी तरह ठप हो गई है।
इनवेस्टर्स के लिए बड़ा रिस्क
निवेशकों को यह समझना होगा कि अगर खाद का स्टॉक क्लियर नहीं हुआ, तो प्लांट को अपनी प्रोसेसिंग क्षमता कम करनी पड़ रही है। इससे प्रोजेक्ट्स के रेवेन्यू पर चोट पड़ रही है और वे उन सरकारी बेंचमार्क्स को पूरा करने में चूक सकते हैं, जो उन्हें सब्सिडी दिलाने के लिए जरूरी हैं।
1,908 के लक्ष्य के मुकाबले केवल 217 प्लांट्स का चालू होना इस सेक्टर की सुस्ती को बयां करता है। अब इंडस्ट्री नई सरकारी पॉलिसी की उम्मीद कर रही है ताकि इस खाद को एनर्जी सिक्योरिटी का हिस्सा माना जाए और इसके लिए एक सुनिश्चित मार्केट तैयार किया जा सके।
