भारत बायो-एनर्जी और सस्टेनेबल एविएशन फ्यूल (SAF) के क्षेत्र में ग्लोबल लीडर बनने की राह पर है। साल 2027 से 2030 के बीच फ्यूल में बायो-एनर्जी की ब्लेंडिंग के लक्ष्य तय कर दिए गए हैं और सरकारी तेल कंपनियां अपनी क्षमताएं बढ़ा रही हैं, जिससे इस सेक्टर में हलचल तेज हो गई है। हालांकि, एक्सपर्ट्स का कहना है कि सफलता सरकारी नियमों को आसान बनाने और कच्चे माल की भरोसेमंद सप्लाई चेन तैयार करने पर निर्भर करेगी। निवेशकों को पॉलिसी अपडेट्स, एनर्जी कंपनियों द्वारा प्रोजेक्ट्स का क्रियान्वयन और फीडस्टॉक लॉजिस्टिक्स में प्रगति पर नज़र रखनी चाहिए।
क्या हुआ
हाल ही में आयोजित इंडिया बायो-एनर्जी कॉन्क्लेव 2026 में इंडस्ट्री के एक्सपर्ट्स ने देश के बायो-एनर्जी सेक्टर के भविष्य पर चर्चा की। मुख्य संदेश साफ था: अगर भारत पॉलिसी प्लानिंग से प्रभावी कार्यान्वयन की ओर बढ़ पाता है, तो यह बायो-एनर्जी, खासकर सस्टेनेबल एविएशन फ्यूल (SAF) का एक बड़ा ग्लोबल एक्सपोर्टर बन सकता है। सम्मेलन में वक्ताओं ने इशारा किया कि महत्वाकांक्षाएं भले ही ऊंची हों, लेकिन मौजूदा रेगुलेटरी ढांचा, जिसमें कई मंत्रालयों की जिम्मेदारियां बंटी हुई हैं, तेज ग्रोथ में बाधा बन सकता है। नए प्रोजेक्ट्स के लिए निर्णय लेने की प्रक्रिया और फंडिंग को आसान बनाने के लिए एक एकीकृत दृष्टिकोण, संभवतः एक सिंगल नोडल एजेंसी के माध्यम से, प्रस्तावित किया गया।
सस्टेनेबल एविएशन फ्यूल (SAF) का अवसर
चर्चा का एक बड़ा आकर्षण भारत की ग्लोबल सस्टेनेबल एविएशन फ्यूल (SAF) मार्केट में हिस्सेदारी बनाने की क्षमता थी। एक्सपर्ट्स का अनुमान है कि भारत ग्लोबल डिमांड का 5 से 7% तक पूरा कर सकता है, जिससे रेवेन्यू का एक बड़ा अवसर पैदा होगा। यह बदलाव सिर्फ एक विचार नहीं है, बल्कि जमीन पर उतर रहा है। इंडियन ऑयल कॉरपोरेशन (Indian Oil Corporation) वर्तमान में पानीपत में देश का पहला SAF प्लांट स्थापित करने पर काम कर रहा है। सरकार ने मार्केट को गति देने के लिए पहले ही स्पष्ट ब्लेंडिंग लक्ष्य तय कर दिए हैं, जिनका लक्ष्य 2027 तक 1% ब्लेंडिंग, 2028 तक 2% और 2030 तक 5% तक पहुंचना है।
निवेशक इसे कैसे देखें?
निवेशकों के लिए, बायो-एनर्जी की कहानी मुख्य रूप से बड़ी सरकारी तेल मार्केटिंग कंपनियों के कैपिटल स्पेंडिंग (Capital Spending) और ऑपरेशनल फोकस से जुड़ी है। ये कंपनियां एनर्जी ट्रांजिशन (Energy Transition) में सबसे आगे हैं, और ऐसे प्लांट में निवेश कर रही हैं जो कचरे को ईंधन में बदल सकते हैं। इस सेक्टर का मूल्यांकन करते समय, केवल नई प्लांट की घोषणाओं से आगे देखना महत्वपूर्ण है। असली परीक्षा कंपनी की इन प्लांट को चलाने के लिए आवश्यक फीडस्टॉक (Feedstock)—जैसे कृषि अपशिष्ट या इस्तेमाल किया हुआ कुकिंग ऑयल—को मैनेज करने की क्षमता होगी। इन सामग्रियों के लिए एक सुचारू सप्लाई चेन (Supply Chain) उनके प्रॉफिट मार्जिन (Profit Margin) को बनाए रखने के लिए महत्वपूर्ण है।
जोखिम और चुनौतियां
हालांकि विकास की कहानी आकर्षक है, लेकिन सेक्टर को वास्तविक बाधाओं का सामना करना पड़ रहा है। उद्योग के प्रतिभागियों ने बताया है कि खंडित शासन (Fragmented Governance)—जहां पेट्रोलियम, कृषि और वित्त जैसे मंत्रालयों के बीच जिम्मेदारियां बंटी हुई हैं—प्रोजेक्ट अप्रूवल (Project Approval) और फंड आवंटन (Fund Allocation) को धीमा कर सकता है। इसके अलावा, बड़े पैमाने पर उत्पादन के लिए जिला स्तर पर कृषि अवशेषों को इकट्ठा करने और प्रोसेस करने के लिए बुनियादी ढांचा स्थापित करने के एक बड़े प्रयास की आवश्यकता है। इन कलेक्शन नेटवर्क (Collection Network) की स्थापना में किसी भी देरी या आवश्यक पैमाने को प्राप्त करने में विफलता, कंपनियों के प्रोजेक्ट टाइमलाइन (Project Timeline) और वित्तीय रिटर्न (Financial Return) को प्रभावित कर सकती है।
निवेशकों को आगे क्या देखना चाहिए?
इस क्षेत्र की निगरानी करने वाले निवेशकों को शुरुआती प्रोजेक्ट घोषणाओं से परे अपडेट देखने चाहिए। पानीपत जैसे बड़े पैमाने के प्लांट के शुरू होने की स्थिति और क्या सरकार बायो-एनर्जी पोर्टफोलियो को मैनेज करने के लिए एक समर्पित नोडल एजेंसी पेश करती है, यह महत्वपूर्ण क्षेत्र हैं जिन पर ध्यान देना चाहिए। इसके अतिरिक्त, फीडस्टॉक की उपलब्धता और लागत के संबंध में मैनेजमेंट की टिप्पणियों पर भी नजर रखें। कंपनियों की अपने मार्जिन को प्रभावित किए बिना कच्चे माल की निरंतर आपूर्ति सुरक्षित करने की क्षमता उनके बायो-एनर्जी प्रोजेक्ट्स की दीर्घकालिक व्यवहार्यता (Long-term Viability) में एक महत्वपूर्ण कारक होगी।
