HSN कोड की गलती से क्यों बढ़ रहा है बैटरी स्टोरेज का खर्च?
Harmonised System of Nomenclature (HSN) कोड को लेकर भारत के तेजी से बढ़ते बैटरी एनर्जी स्टोरेज सेक्टर में बड़ी दिक्कतें आ रही हैं। पोर्ट्स पर एडवांस्ड बैटरी एनर्जी स्टोरेज सिस्टम्स (BESS) को अक्सर साधारण पावर बैंक मान लिया जाता है। इस गलत क्लासिफिकेशन की वजह से उन पर कस्टम ड्यूटी (Customs Duty) काफी ज्यादा लग रही है, जिससे प्रोजेक्ट्स की लागत बढ़ गई है और ग्रिड-स्केल स्टोरेज (Grid-scale storage) के विस्तार में देरी हो रही है।
इंडस्ट्री की क्या है मांग?
इंडस्ट्री के प्रतिनिधियों ने पावर मिनिस्ट्री (Power Ministry) से इस मामले में तुरंत बदलाव की अपील की है। उनकी मांग है कि बैटरी सेल्स, बैटरी पैक्स और पूरे स्टोरेज सिस्टम के लिए अलग-अलग HSN कोड तय किए जाएं। साथ ही, सोलर मॉड्यूल्स की तरह ही बैटरी बनाने वाले अप्रूव्ड मैन्युफैक्चरर्स (Approved Manufacturers) की एक ऑफिशियल लिस्ट भी जारी की जाए, ताकि देश में मजबूत सप्लाई चेन बन सके। इसके अलावा, BESS प्रोजेक्ट्स के लिए कस्टम ड्यूटी में छूट (Deferment) को उनके पूरे 12 साल के ऑपरेशनल लाइफटाइम तक बढ़ाया जाए।
रिन्यूएबल एनर्जी के लक्ष्यों के लिए क्यों जरूरी?
ये क्लासिफिकेशन की दिक्कतें ऐसे समय में आ रही हैं जब भारत ग्रिड-लेवल एनर्जी स्टोरेज का तेजी से विस्तार कर रहा है। ये सिस्टम्स सोलर और विंड जैसी वेरिएबल रिन्यूएबल एनर्जी (Variable Renewable Energy) को इंटीग्रेट करने, ग्रिड की स्टेबिलिटी (Grid Stability) बनाए रखने और पीक पावर की जरूरतें पूरी करने के लिए बेहद अहम हैं। इंडस्ट्री ने यह भी बताया कि मौजूदा नियम स्टोरेज सिस्टम को सिर्फ पास की रिन्यूएबल एनर्जी सोर्स से चार्ज करने की इजाजत देते हैं, और वे एसेट्स के बेहतर इस्तेमाल के लिए नॉन-रिन्यूएबल ग्रिड से चार्ज करने की अनुमति चाहते हैं।
अनिश्चितता के कारण ग्रोथ पर खतरा
इंडिया एनर्जी स्टोरेज अलायंस (India Energy Storage Alliance) के अनुसार, स्टेशनरी एनर्जी स्टोरेज की डिमांड 2035 तक सालाना 23% से ज्यादा बढ़ने का अनुमान है। हालांकि, मौजूदा रेगुलेटरी कन्फ्यूजन (Regulatory Confusion) और बढ़ती लागत सीधे तौर पर इन महत्वाकांक्षी ग्रोथ टारगेट्स और भारत के क्लीन एनर्जी (Clean Energy) लक्ष्यों के लिए खतरा पैदा कर रही है।
