भारत का बैटरी एनर्जी स्टोरेज सिस्टम (BESS) सेक्टर बड़ी छलांग लगाने को तैयार है। अनुमान है कि यह **91%** की CAGR से बढ़कर फाइनेंशियल ईयर **2032** तक **302GWh** के आंकड़े को छू लेगा। हालांकि, इस ग्रोथ के बीच इंपोर्ट पर निर्भरता और प्रोजेक्ट में देरी जैसे रिस्क भी निवेशकों के लिए बड़े फैक्टर हैं।
भारत का बैटरी एनर्जी स्टोरेज सिस्टम (BESS) सेक्टर अब एक छोटे बाजार से निकलकर देश के एनर्जी इंफ्रास्ट्रक्चर का सबसे अहम हिस्सा बनने जा रहा है। Nuvama की रिपोर्ट्स के मुताबिक, यह क्षमता FY26 के 6.3GWh से बढ़कर FY32 तक 302GWh तक पहुंचने का अनुमान है। इस रफ्तार के पीछे मुख्य वजह सोलर और विंड जैसे रिन्यूएबल एनर्जी सोर्सेज को ग्रिड के साथ स्टेबल बनाए रखने की जरूरत है।
मैन्युफैक्चरिंग और इंपोर्ट का गणित
फिलहाल, भारत अपनी बैटरी जरूरतों का 89% हिस्सा विदेशों (खासकर चीन) से मंगाता है। यह निर्भरता जियो-पॉलिटिकल रिस्क और सप्लाई चेन में रुकावट पैदा कर सकती है। इस चुनौती से निपटने के लिए सरकार ने एडवांस केमिस्ट्री सेल मैन्युफैक्चरिंग के लिए ₹18,100 करोड़ की PLI स्कीम का ऐलान किया है, ताकि देश 'आत्मनिर्भर' बन सके।
मुनाफे का खेल (Profitability)
बैटरी स्टोरेज में मुनाफा सेगमेंट के हिसाब से अलग-अलग है। कमर्शियल, इंडस्ट्रियल और रिटेल सेगमेंट में EBITDA मार्जिन 17% से 20% के बीच है, जो इसे आकर्षक बनाता है। वहीं, ग्रिड बैलेंसिंग के लिए जरूरी यूटिलिटी-स्केल सेगमेंट में मार्जिन थोड़ा कम यानी 9% के आसपास रहता है, लेकिन इसका पेबैक पीरियड सिर्फ 1 से 2 साल होने के कारण कंपनियां इसे पसंद करती हैं। Tata Power, Adani Energy Solutions, JSW Energy और Amara Raja जैसे बड़े खिलाड़ी इस रेस में पूरी मजबूती से लगे हुए हैं।
निवेशकों के लिए चेतावनी
तेजी की संभावनाओं के बीच कुछ रिस्क को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। ग्रिड कनेक्टिविटी, फाइनेंशियल क्लोजर और PPA की दिक्कतों के कारण प्रोजेक्ट्स में अक्सर 9 से 18 महीने की देरी हो जाती है। इसके अलावा, सरकारी टेंडरों में आक्रामक बिडिंग (Aggressive Bidding) के कारण टैरिफ पर दबाव बढ़ सकता है, जो भविष्य में कंपनियों के मुनाफे को चोट पहुंचा सकता है। निवेशकों को यह देखना होगा कि कंपनियां रॉ मटेरियल की कीमतों को कैसे मैनेज करती हैं और कितनी तेजी से प्रोजेक्ट्स को पूरा करती हैं।
