साल 2047 तक 100 गीगावाट (GW) परमाणु ऊर्जा क्षमता हासिल करने के भारत के बड़े लक्ष्य को ईंधन की भारी किल्लत का सामना करना पड़ रहा है। संसद की एक हालिया रिपोर्ट से पता चला है कि देश का घरेलू यूरेनियम उत्पादन, ज़रूरत के मुकाबले महज़ **30%** है, जिससे आयात पर भारी निर्भरता बनी हुई है। यह पावर ऑपरेटर्स के लिए सप्लाई चेन का बड़ा जोखिम पैदा कर रहा है, और खनन विस्तार व विदेशी पार्टनरशिप की ज़रूरत पर ज़ोर दिया जा रहा है।
यूरेनियम की कमी से परमाणु ऊर्जा का भविष्य?
भारत अपनी परमाणु ऊर्जा क्षमता को तेज़ी से बढ़ाकर साल 2047 तक 100 GW तक ले जाने की तैयारी कर रहा है। लेकिन इस महत्वाकांक्षी विस्तार के रास्ते में एक बड़ी चुनौती खड़ी हो गई है - ईंधन की कमी। संसदीय समिति की एक रिपोर्ट में बताया गया है कि देश की प्रेशरराइज़्ड हैवी वॉटर रिएक्टर्स (PHWRs) के लिए यूरेनियम ऑक्साइड की सालाना ज़रूरत 5,400 टन अनुमानित है। मगर, मौजूदा घरेलू उत्पादन इस मांग का केवल 30% ही पूरा कर पाता है, जिसके चलते परमाणु कार्यक्रम पूरी तरह से विदेशी सप्लायर्स पर निर्भर हो गया है।
विदेशी सप्लाई पर निर्भरता और ऑपरेशनल रिस्क
कज़ाकिस्तान, रूस, उज़्बेकिस्तान और कनाडा जैसे देशों से यूरेनियम आयात करने की यह निर्भरता सप्लाई चेन के लिए बड़ा ख़तरा है। निवेशकों और ऊर्जा क्षेत्र से जुड़े लोगों के लिए यह एक चिंता का बड़ा विषय है। परमाणु ऊर्जा प्लांट लगाना बहुत महंगा सौदा होता है, और इन प्लांट्स को पूरी क्षमता से चलाने के लिए ईंधन की लगातार सप्लाई ज़रूरी है। ऐसे में, इन देशों में किसी भी तरह के भू-राजनीतिक तनाव या बाज़ार में उतार-चढ़ाव का सीधा असर ईंधन की उपलब्धता पर पड़ सकता है, जो कि न्यूक्लियर पावर कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड (NPCIL) द्वारा संचालित प्लांट्स की स्थिरता को खतरे में डाल सकता है।
ईंधन की सुरक्षा के लिए क्या है रणनीति?
इस समस्या से निपटने के लिए सरकार कई मोर्चों पर काम कर रही है। यूरेनियम कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड (UCIL) साल 2036 तक घरेलू उत्पादन को दोगुना करने की दिशा में काम कर रही है। इसके लिए, झारखंड, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में खनन क्षमता का विस्तार और नई खदानें खोली जा रही हैं। हालांकि, क्षमता विस्तार की आक्रामक योजनाओं और घरेलू उत्पादन बढ़ाने की समय-सीमा के बीच एक बड़ा अंतर नज़र आ रहा है। देश जहां तेज़ी से अपने रिएक्टरों की संख्या बढ़ाना चाहता है, वहीं नई खनन क्षमता को शुरू करने में हो रही देरी एक बड़ी बाधा बन सकती है, जिस पर बारीकी से नज़र रखने की ज़रूरत है।
एक और महत्वपूर्ण कदम यह है कि UCIL और NTPC के बीच एक ज्वाइंट वेंचर (JV) का प्रस्ताव है। इस पार्टनरशिप का मकसद विदेशी यूरेनियम एसेट्स (संपत्ति) हासिल करना है, ताकि कीमतों में होने वाले उतार-चढ़ाव से बचा जा सके और ईंधन की एक भरोसेमंद सप्लाई लाइन सुनिश्चित हो सके। हालांकि, इस कॉन्सेप्ट का मकसद लंबे समय में ईंधन की लागत को स्थिर करना है, लेकिन इस JV की सफलता सरकार की ओर से कार्यान्वयन की समय-सीमा तय करने और अंतरराष्ट्रीय खनन निवेशों की जटिलताओं को सुलझाने पर निर्भर करेगी।
निवेशकों को किन बातों पर नज़र रखनी चाहिए?
ऊर्जा क्षेत्र पर नज़र रखने वाले निवेशकों के लिए, UCIL-NTPC ज्वाइंट वेंचर की प्रगति और नई घरेलू खनन परियोजनाओं की समय-सीमा को ट्रैक करना सबसे अहम होगा। सरकार इन परियोजनाओं को कितनी तेज़ी से आगे बढ़ा पाती है, यही तय करेगा कि परमाणु क्षेत्र ईंधन की कमी के बिना अपनी विकास गति बनाए रख पाएगा या नहीं। इसके अलावा, यूरेनियम की सोर्सिंग (प्राप्ति) में कोई भी बदलाव या अंतरराष्ट्रीय व्यापार नीतियों में फेरबदल, देश के परमाणु ऊर्जा रोडमैप की दीर्घकालिक व्यवहार्यता का एक महत्वपूर्ण संकेतक बना रहेगा।
