Global Wind Energy Council (GWEC) ने भारतीय विंड कंपनियों को सलाह दी है कि वे केवल टरबाइन बनाने तक सीमित न रहें। उन्हें विंड के साथ सोलर और स्टोरेज को जोड़कर 'इंटीग्रेटेड पावर सॉल्यूशंस' देने होंगे, तभी भारत **2030** तक **100 GW** के लक्ष्य को हासिल कर पाएगा।
मॉडल बदलने की क्यों है जरूरत?
अब वक्त आ गया है जब भारतीय कंपनियां हार्डवेयर-ओनली मॉडल को पीछे छोड़ें। भारत की कुल विंड कैपेसिटी अगस्त 2026 तक 58.52 GW रही है। मौजूदा फाइनेंशियल ईयर में 7.5 GW से 8 GW जोड़ने का लक्ष्य है, जो 2030 तक के बड़े टारगेट को पूरा करने के लिए काफी नहीं है। अब टरबाइन सप्लाई करने वाली कंपनियों को पावर प्रोजेक्ट्स डेवलप करने वाली कंपनियों में बदलना होगा, ताकि वे ग्रिड और इंडस्ट्रियल बायर्स की बढ़ती जटिल मांग को पूरा कर सकें।
निवेशकों के लिए क्या बदलेगा?
यह बदलाव कंपनियों की फाइनेंशियल प्रोफाइल को पूरी तरह बदल देगा। इंटीग्रेटेड पावर सॉल्यूशंस के लिए कंपनियों को डिमांड, प्राइसिंग और ग्रिड मैनेजमेंट को समझना होगा। इससे कॉन्ट्रैक्ट की वैल्यू और मार्जिन बढ़ सकते हैं, लेकिन साथ ही कैपिटल इन्वेस्टमेंट और टेक्निकल कैपेबिलिटी की जरूरत भी काफी बढ़ जाएगी। रिस्क अब केवल मैन्युफैक्चरिंग तक सीमित नहीं, बल्कि लॉन्ग-टर्म प्रोजेक्ट एग्जीक्यूशन पर शिफ्ट हो जाएगा।
रास्ते में कौन-सी चुनौतियां हैं?
देश में टरबाइन मैन्युफैक्चरिंग कैपेसिटी तो 24 GW है, लेकिन असल काम ग्रिड इंफ्रास्ट्रक्चर की कमी से रुक जाता है। जब तक ट्रांसमिशन लाइनें तैयार नहीं होंगी, प्रोजेक्ट्स में देरी और लागत बढ़ना तय है। सबसे बड़ा रिस्क डिस्कॉम (DISCOMs) की माली हालत है। अगर बिजली खरीदने वाले राज्य के सरकारी डिस्ट्रीब्यूशन कंपनियां समय पर भुगतान नहीं करेंगी, तो प्रोजेक्ट डेवलपर्स का कैश फ्लो बुरी तरह प्रभावित होगा। इसके अलावा, जमीन अधिग्रहण और परमिट में देरी भी एक बड़ी रुकावट बनी हुई है।
