अमेरिका में 2026 के नए कानून के तहत रूसी क्रूड पर **100%** तक टैरिफ लगाने की चेतावनी से भारतीय एनर्जी कंपनियों की चिंताएं बढ़ गई हैं। सप्लाई चेन में बदलाव और महंगे क्रूड के कारण रिफाइनिंग मार्जिन पर दबाव का खतरा मंडरा रहा है।
भारत की ऑयल रिफाइनिंग कंपनियां अब 'Lindsey O. Graham Sanctioning Russia and Iran Act of 2026' के लागू होने के बाद अपनी स्ट्रैटेजी को पूरी तरह बदल रही हैं। इस अमेरिकी कानून में रूसी क्रूड पर 100% तक टैरिफ लगाने का प्रावधान है, जिसने घरेलू कंपनियों के सामने सप्लाई और लागत का बड़ा जोखिम खड़ा कर दिया है। सरकार का कहना है कि एनर्जी सिक्योरिटी सबसे पहले है, लेकिन इंडस्ट्री अब फूँक-फूँक कर कदम उठा रही है।
मार्जिन पर असर का डर
Indian Oil Corporation, Bharat Petroleum, Hindustan Petroleum और Reliance Industries जैसी कंपनियों के लिए रूसी तेल अब तक कमाई का सबसे बड़ा जरिया रहा है। हालांकि अभी $8 प्रति बैरल का प्रीमियम चुकाना पड़ रहा है, फिर भी रूसी 'Urals' ग्लोबल मार्केट में सबसे सस्ता विकल्प बना हुआ है। पिछले कुछ महीनों के डेटा पर नजर डालें तो सितंबर में रूसी क्रूड का आयात घटकर 1.8 मिलियन बैरल रोजाना रह गया है, जो अगस्त में 2.1 मिलियन बैरल था।
डायवर्सिफिकेशन पर जोर
टैरिफ के खतरे को देखते हुए कंपनियां अब पुराने सप्लायर्स की तरफ वापस लौट रही हैं। रूसी तेल पर निर्भरता जो गर्मियों में करीब 50% थी, वह सितंबर में घटकर 34% रह गई है। रिफाइनर्स अब इराक, सऊदी अरब, यूएई (UAE) के साथ-साथ अफ्रीका और अमेरिका से भी क्रूड मंगाने की तैयारी कर रहे हैं।
निवेशकों के लिए बड़ी सीख
मार्केट की नजर अब इस बात पर है कि क्या क्रूड की बढ़ती खरीद लागत को कंपनियां ग्राहकों पर डाल पाएंगी? यदि मार्जिन पर दबाव बढ़ा तो इसका सीधा असर कंपनियों के मुनाफे पर दिखेगा। केंद्रीय मंत्री पीयूष गोयल जल्द ही अमेरिकी प्रतिनिधियों से इस मामले पर चर्चा कर सकते हैं, जिस पर निवेशकों को पैनी नजर रखनी चाहिए।
