Indian Oil Corporation और Reliance Industries समेत भारत की बड़ी रिफाइनरी कंपनियां अब क्रूड ऑइल के लिए खुद टैंकर हायर कर रही हैं। सरकार द्वारा क्रू मेंबर भर्ती के नियमों में ढील देने के बाद, कंपनियां लॉजिस्टिक्स कॉस्ट को कम करने की तैयारी में हैं।
लॉजिस्टिक्स पर बढ़ती पकड़
भारतीय रिफाइनरी कंपनियां अब तक 'कॉस्ट-एंड-फ्रेट' कॉन्ट्रैक्ट्स पर निर्भर थीं, जहां डिलीवरी की जिम्मेदारी सप्लायर की होती थी। लेकिन अब Indian Oil Corporation, Reliance Industries, Bharat Petroleum और HPCL-Mittal Energy ने 'फ्री-ऑन-बोर्ड' खरीदारी की ओर रुख किया है। इससे कंपनियों को अपनी सप्लाई चेन पर अधिक नियंत्रण मिलेगा।
नियमों में बदलाव का फायदा
यह रणनीतिक बदलाव 'Directorate General of Shipping' द्वारा नियमों में अपडेट के बाद आया है। पहले 'Strait of Hormuz' से गुजरने वाले जहाजों पर भारतीय क्रू को नियुक्त करने को लेकर सख्त सुरक्षा नियम थे। अब नए 'कंसेंट-बेस्ड' फ्रेमवर्क के कारण रिफाइनरी कंपनियां अपने जहाजों को आसानी से ऑपरेट कर पा रही हैं।
क्यों लिया गया यह फैसला?
मुख्य मकसद अंतरराष्ट्रीय ट्रेडर्स को दिए जाने वाले भारी प्रीमियम से बचना है। साथ ही, अक्टूबर डिलीवरी के लिए इराकी क्रूड पर मिल रही आकर्षक छूट का फायदा उठाने के लिए कंपनियां अपनी लॉजिस्टिक्स लागत को घटाने में जुटी हैं।
निवेशकों के लिए जोखिम
हालांकि, यह कदम मार्जिन बढ़ाने के लिए उठाया गया है, लेकिन इसके साथ चुनौतियां भी हैं। स्ट्रेट ऑफ होर्मुज एक संवेदनशील इलाका है। अब तक ट्रांजिट जोखिम ट्रेडर्स उठाते थे, लेकिन अब कंपनियों को खुद सुरक्षा, बीमा (Insurance) और अनुपालन (Compliance) जैसी जटिलताओं को संभालना होगा।
निवेशकों को आगामी तिमाही नतीजों पर नजर रखनी चाहिए कि क्या यह रणनीति वास्तव में ऑपरेटिंग मार्जिन में सुधार लाती है, या फ्लीट मैनेजमेंट का खर्च फायदे पर भारी पड़ जाता है। इसके अलावा, डॉलर के मुकाबले रुपये की चाल भी क्रूड इंपोर्ट बिल पर सीधा असर डालती रहेगी।
