सप्लाई चेन में आ रही रुकावटों के चलते भारतीय ऑयल रिफाइनरीज अब रूस से कच्चा तेल मंगाना कम कर रही हैं। रूस से आयात घटकर **1.8 से 2.0 मिलियन बैरल** प्रतिदिन रहने का अनुमान है, जिससे कंपनियों के मुनाफे और ऑपरेशनल कॉस्ट पर दबाव बढ़ सकता है।
रूस से कच्चे तेल की सप्लाई में आ रही लॉजिस्टिकल दिक्कतों और चीन की बढ़ती प्रतिस्पर्धा के कारण भारतीय रिफाइनरीज अपनी खरीद रणनीति को पूरी तरह बदल रही हैं। जून-जुलाई में जो आयात 2.7 मिलियन बैरल प्रतिदिन के पीक पर था, वह अब गिरकर 1.8 से 2.0 मिलियन बैरल पर सिमटने की उम्मीद है।
कंपनियों का नया रूट
Indian Oil Corp., Hindustan Petroleum और Mangalore Refinery and Petrochemicals Ltd. जैसी बड़ी कंपनियां अब अमेरिका, वेस्ट अफ्रीका और वेनेजुएला से तेल खरीदने पर जोर दे रही हैं। हालांकि यह कदम देश की एनर्जी सिक्योरिटी के लिए जरूरी है, लेकिन इसका सीधा असर कंपनियों के खर्च पर पड़ेगा। रूस से आने वाला तेल छोटा रास्ता तय करता था, जबकि पश्चिमी देशों से तेल मंगाने में शिपिंग का समय और लागत दोनों काफी बढ़ जाएंगे।
मार्जिन पर असर
मई 2024 के बाद पहली बार ऐसा हुआ है कि रूसी 'Urals' क्रूड पर मिलने वाला डिस्काउंट खत्म हो गया है और यह 'Dated Brent' के मुकाबले प्रीमियम पर ट्रेड कर रहा है। पिछले दो सालों में इसी डिस्काउंट ने रिफाइनर्स के मुनाफे को बूस्ट किया था। अब बढ़ते लॉजिस्टिक्स खर्च और प्रीमियम प्राइसिंग के कारण आने वाली तिमाहियों में कंपनियों के मार्जिन पर गहरा असर पड़ सकता है।
रिफाइनरीज के सामने चुनौती केवल खर्च की नहीं, बल्कि ऑपरेशनल भी है। अलग-अलग देशों से आने वाले क्रूड को प्रोसेस करने के लिए रिफाइनरी के कॉन्फ़िगरेशन में लगातार बदलाव करने पड़ते हैं, जिससे आउटपुट और क्वालिटी बनाए रखना बड़ी चुनौती है। आने वाले समय में निवेशकों की नजर रिफाइनिंग मार्जिन और कैश फ्लो पर बनी रहेगी, क्योंकि बढ़ती घरेलू मांग के बीच कंपनियों के पास लागत का बोझ मैनेज करने की चुनौती है।
