भारतीय रिफाइनरियों ने यूरोप को होने वाली डीजल सप्लाई का **60%** हिस्सा हासिल कर लिया है, लेकिन सरकार द्वारा एक्सपोर्ट ड्यूटी को बढ़ाकर **₹25 प्रति लीटर** कर देने से कंपनियों के मुनाफे पर असर पड़ रहा है।
दुनिया भर में डीजल की किल्लत के बीच भारतीय रिफाइनरियों ने यूरोप के बाजार में अपनी मजबूत पकड़ बना ली है। सऊदी अरब की 400,000 बैरल प्रति दिन क्षमता वाली 'जजान रिफाइनरी' के बंद होने और रूसी फ्यूल एक्सपोर्ट में गिरावट के बाद, भारतीय कंपनियों ने यूरोप की ओर रुख किया है। अगस्त 2026 के डेटा के मुताबिक, रिलायंस इंडस्ट्रीज समेत प्रमुख भारतीय रिफाइनरियों ने 'बाब-अल-मंडेब' जलडमरूमध्य से होकर यूरोप जाने वाले डीजल शिपमेंट का 60% हिस्सा पूरा किया है।
मुनाफे पर क्यों है दबाव?
евроपीय बाजार में डीजल की कीमतें ऊंची रहने से रिफाइनरियों को अच्छा 'क्रैक स्प्रेड' (मुनाफा) मिल रहा है। लेकिन, इस कमाई पर सरकार की पैनी नजर है। 1 सितंबर 2026 से सरकार ने डीजल पर एक्सपोर्ट ड्यूटी बढ़ाकर ₹25 प्रति लीटर और पेट्रोल पर ₹1.5 प्रति लीटर का लेवी लगा दी है। इसका मकसद रिफाइनरियों द्वारा कमाए जा रहे 'विंडफॉल प्रॉफिट' को नियंत्रित करना है। यही वजह है कि एक्सपोर्ट के शानदार आंकड़ों के बावजूद निवेशकों को कंपनियों के नेट प्रॉफिट पर उतना फायदा नहीं दिख रहा।
कच्चे माल और भविष्य की चुनौतियां
रिफाइनरियों के सामने कच्चे माल की उपलब्धता भी एक बड़ी चुनौती है। अगस्त 2026 में भारत का क्रूड और कंडेनसेट इंपोर्ट घटकर 3.8 मिलियन बैरल प्रति दिन रह गया, जो एक साल पहले 4.8 मिलियन बैरल था। इसके अलावा, पश्चिम एशिया में बढ़ता भू-राजनीतिक तनाव शिपिंग लागत बढ़ा सकता है। भविष्य में निवेशकों के लिए सरकारी टैक्स पॉलिसी (SAED) और ग्लोबल सप्लाई चेन पर नजर रखना बेहद जरूरी होगा, क्योंकि एक्सपोर्ट ड्यूटी में कोई भी बदलाव मुनाफे के गणित को पूरी तरह बदल सकता है।
