Indian Oil Corporation (IOC) ने क्षेत्रीय संघर्षों और बढ़ती शिपिंग लागत के चलते फाइनेंशियल ईयर 2027/28 के लिए मिडिल ईस्ट से अपने लॉन्ग-टर्म कच्चे तेल के कॉन्ट्रैक्ट्स को कम करने का फैसला किया है।
Indian Oil Corporation ने अपनी क्रूड प्रोक्योरमेंट रणनीति में बड़ा बदलाव किया है। कंपनी ने तय किया है कि वह अनिश्चित वैश्विक हालातों को देखते हुए अब मिडिल ईस्ट के सप्लायर्स के साथ लंबे समय के फिक्स्ड कॉन्ट्रैक्ट्स पर अपनी निर्भरता घटाएगी। पिछले फाइनेंशियल ईयर में, कंपनी के कुल कच्चे तेल के आयात में इन कॉन्ट्रैक्ट्स की हिस्सेदारी 47% थी। अब कंपनी अपना ध्यान 'स्पॉट मार्केट' की तरफ मोड़ रही है, जो कठिन समय में अधिक फ्लेक्सिबिलिटी प्रदान करता है।
क्यों लिया गया यह फैसला?
हॉर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) के पास जारी तनाव और क्षेत्रीय संघर्षों ने समुद्री रसद (Maritime Logistics) को बुरी तरह प्रभावित किया है। इस कारण फ्रेट रेट्स रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गए हैं, जिससे पुराने लॉन्ग-टर्म डिलीवरी कॉन्ट्रैक्ट्स अब महंगे साबित हो रहे हैं। हालांकि मिडिल ईस्ट के उत्पादक अपनी मार्केट हिस्सेदारी बनाए रखने के लिए डिस्काउंट दे रहे हैं, लेकिन क्षेत्र में अस्थिरता के कारण आपूर्ति की निरंतरता पर बड़ा सवालिया निशान है।
परिचालन लागत और एसेट का संकट
कंपनी के विस्तार की योजनाओं पर भी इसका असर दिख रहा है। 'वेरी लार्ज गैस कैरियर्स' (VLGCs) खरीदने की योजना फिलहाल मुश्किल में है। जुलाई में टेंडर लॉन्च होने के बाद से इन जहाजों की लागत दोगुनी होकर $150 मिलियन तक पहुंच गई है। बढ़ती शिपिंग लागत और एसेट की ऊंची कीमत कंपनी के रिफाइनिंग मार्जिन के लिए बड़ी चुनौती बनी हुई है।
आने वाले समय में निवेशकों की नजर इस बात पर होगी कि कंपनी अपनी सप्लाई चेन की लागत को कैसे मैनेज करती है। ग्लोबल फ्रेट इन्फ्लेशन और क्रूड की कीमतों में उतार-चढ़ाव कंपनी के फाइनेंशियल हेल्थ के लिए आगे भी महत्वपूर्ण ट्रिगर बने रहेंगे।
