इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन (IOC) को जून तिमाही में **₹2,661 करोड़** का नेट लॉस (Net Loss) हुआ है। यह पिछले 15 तिमाहियों में कंपनी को हुआ पहला घाटा है। कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों और निगेटिव फ्यूल मार्केटिंग मार्जिन (Fuel Marketing Margins) ने कंपनी की कमाई पर भारी दबाव डाला है, भले ही रेवेन्यू (Revenue) में **26%** की बढ़ोतरी हुई हो।
मुनाफे से घाटे में कैसे आई कंपनी?
इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन (IOC) ने 30 जून को खत्म हुई तिमाही के लिए ₹2,661 करोड़ का नेट लॉस (Net Loss) दर्ज किया है। पिछले साल की इसी तिमाही में कंपनी ने ₹5,689 करोड़ का प्रॉफिट (Profit) कमाया था। यह लगातार 15 तिमाहियों में पहला मौका है जब सरकारी ऑयल रिफाइनर को घाटा हुआ है। यह ग्लोबल एनर्जी की बढ़ी हुई कीमतों के कारण कंपनी पर आए भारी फाइनेंशियल प्रेशर को दिखाता है।
कच्चे तेल की कीमतों का असर
कंपनी के नतीजों पर सबसे ज्यादा असर ब्रेंट क्रूड (Brent Crude) की बढ़ी कीमतों का पड़ा है, जो पिछले साल के मुकाबले लगभग 45% महंगी हुई है। सरकारी ऑयल मार्केटिंग कंपनियां अक्सर ग्राहकों के लिए रिटेल फ्यूल की कीमतों को स्टेबल रखने के लिए प्राइस वोलेटिलिटी (Price Volatility) का कुछ हिस्सा खुद झेल लेती हैं। ऐसे में, कच्चे तेल को एक्वायर (Acquire) और प्रोसेस करने की लागत, पंप पर बेचे जाने वाले फ्यूल की कीमत से कहीं ज़्यादा तेज़ी से बढ़ी। इस वजह से तिमाही के दौरान पेट्रोल और डीजल पर फ्यूल मार्केटिंग मार्जिन निगेटिव हो गए। इंडस्ट्री एनालिसिस के मुताबिक, इन मार्जिन पर खास असर इसलिए पड़ा क्योंकि बढ़ी हुई लागत को सीधे ग्राहकों पर नहीं डाला जा सका।
खर्च और रेवेन्यू का गणित
IOC का रेवेन्यू पिछले साल के मुकाबले 26.2% बढ़कर ₹2.76 ट्रिलियन रहा, लेकिन यह बढ़ोतरी बढ़ते खर्चों को पूरा करने के लिए काफी नहीं थी। रॉ मटेरियल (Raw Material) की लागत में 77% की भारी बढ़ोतरी के चलते कुल ऑपरेशनल खर्च 32% बढ़ गया। कंपनी को लिक्विफाइड पेट्रोलियम गैस (LPG) बिजनेस में हुए नुकसान के लिए सरकार से ₹3,622 करोड़ का कंपनसेशन (Compensation) मिला, जिसने कुछ हद तक नुकसान को कम किया, लेकिन कुल घाटे को रोकने में नाकाम रहा।
पूरे सेक्टर पर फाइनेंशियल दबाव
IOC अकेली ऐसी कंपनी नहीं है जो इन चुनौतियों का सामना कर रही है। इसी अवधि के लिए अन्य सरकारी कंपनियों, जैसे भारत पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन (BPCL) और हिंदुस्तान पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन (HPCL) ने भी तिमाही घाटे की रिपोर्ट दी है। यह सेक्टर इस समय हाई इनपुट कॉस्ट (High Input Cost) और डोमेस्टिक फ्यूल डिमांड (Domestic Fuel Demand) में आई हालिया नरमी से जूझ रहा है। अप्रैल, मई और जून में फ्यूल डिमांड में गिरावट दर्ज की गई थी। हाई रॉ मटेरियल प्राइस और स्थिर कंजम्पशन लेवल के इस माहौल में रिफाइनर्स के लिए हेल्दी प्रॉफिट मार्जिन बनाए रखना मुश्किल हो रहा है।
निवेशकों को क्या देखना चाहिए?
आगे चलकर निवेशकों के लिए सबसे महत्वपूर्ण बात ग्लोबल क्रूड ऑयल कीमतों की चाल होगी और क्या सरकार सरकारी रिफाइनर्स को और राहत या सपोर्ट प्रदान करती है। मार्केट एक्सपर्ट्स का ध्यान इस बात पर भी रहेगा कि आने वाली तिमाहियों में फ्यूल मार्केटिंग मार्जिन पॉजिटिव टेरिटरी (Positive Territory) में लौटते हैं या नहीं, और डोमेस्टिक फ्यूल कंजम्पशन में लगातार रिकवरी दिखती है या नहीं। निवेशकों को कंपनी की कैपिटल स्पेंडिंग (Capital Spending) योजनाओं और कर्ज प्रोफाइल में किसी भी बदलाव पर भी नज़र रखनी चाहिए, क्योंकि कंपनी इन शॉर्ट-टर्म ऑपरेशनल चुनौतियों से निपट रही है।
