अनुपालन की इकोनॉमिक्स
ब्लेंडिंग मैंडेट्स (Blending Mandates) की ओर यह कदम भारत की एनर्जी स्ट्रेटेजी (Energy Strategy) का हिस्सा है, लेकिन आर्थिक पक्ष काफी चुनौतीपूर्ण है। इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन (Indian Oil Corporation), भारत पेट्रोलियम (Bharat Petroleum) और हिंदुस्तान पेट्रोलियम (Hindustan Petroleum) जैसी कंपनियों को SAF प्रोडक्शन के लिए भारी लागत उठानी पड़ रही है, जिसके लिए महंगी रिफाइनरी अपग्रेड (Refinery Upgrades) की जरूरत है। मुख्य समस्या SAF और पारंपरिक जेट फ्यूल के बीच कीमत का बड़ा अंतर है। चूंकि SAF प्रोडक्शन की लागत 3 से 5 गुना ज्यादा है, इसलिए इसे अपनाने में रुकावट आ सकती है, जब तक कि सरकार वायबिलिटी गैप फंडिंग (Viability Gap Funding) या टैक्स ब्रेक (Tax Breaks) के जरिए वित्तीय सहायता न दे।
अस्थिरता के बीच प्रोडक्शन बढ़ाना
रिफाइनरी अपग्रेड्स पर काम चल रहा है, लेकिन ये प्रोजेक्ट्स ग्लोबल ऑयल प्राइस वोलेटिलिटी (Global Oil Price Volatility) के प्रति संवेदनशील हैं, खासकर पश्चिम एशिया से। इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन ने एयरलाइंस के साथ शुरुआती डील की हैं, इस उम्मीद में कि वॉल्यूम (Volume) बढ़ने से अंततः लागत कम होगी। हालांकि, प्रॉफिटेबिलिटी (Profitability) अनिश्चित बनी हुई है। यूरोप के विपरीत, जहां कार्बन प्राइसिंग (Carbon Pricing) ने पहले ही SAF के इस्तेमाल को बढ़ावा दिया है, भारतीय रिफाइनरों को उत्सर्जन लक्ष्यों (Emission Goals) और किफायती हवाई यात्रा की जरूरत के बीच संतुलन बनाना होगा। छोटी कीमत वृद्धि से तत्काल नुकसान की भरपाई हो सकती है, लेकिन इस्तेमाल किए गए कुकिंग ऑयल जैसे फीडस्टॉक्स (Feedstocks) पर निर्भरता सप्लाई चेन (Supply Chain) के जोखिम पैदा कर सकती है, जो प्रोडक्शन की निरंतरता को प्रभावित कर सकते हैं।
स्ट्रक्चरल कमजोरियां
इन कंपनियों का सरकारी नीतियों पर निर्भरता रेगुलेटरी रिस्क (Regulatory Risk) पैदा करती है। अगर रिफाइनरी प्रॉफिट्स को बचाने के लिए राष्ट्रीय SAF पॉलिसी (National SAF Policy) को अंतिम रूप नहीं दिया गया, तो ये निवेश विफल हो सकते हैं। ग्लोबल ऑयल कंपनियां अक्सर SAF के नुकसान की भरपाई के लिए कार्बन क्रेडिट्स (Carbon Credits) का इस्तेमाल करती हैं, जो भारतीय कंपनियों के लिए अभी पूरी तरह उपलब्ध नहीं है। अपने मौजूदा डेट लेवल (Debt Levels) को देखते हुए, इन सरकारी कंपनियों में लंबे समय तक नुकसान झेलने की क्षमता सीमित है, अगर SAF 2028 तक बहुत महंगा रहता है।
भविष्य का आउटलुक
कंपनी के लीडर्स को उम्मीद है कि 1% SAF ब्लेंडिंग का 2027 का मैंडेट (Mandate) एक स्थिर मार्केट बनाएगा। विश्लेषकों का मानना है कि इन प्रयासों की सफलता पूरी तरह से सरकार की प्रारंभिक मूल्य वृद्धि को प्रबंधित करने की प्रतिबद्धता पर निर्भर करती है। जब तक घरेलू नीति स्पष्ट नहीं हो जाती, तब तक इन रिफाइनरी निवेशों को अनिश्चित रिटर्न (Uncertain Returns) वाले लॉन्ग-टर्म प्रोजेक्ट्स (Long-term Projects) के रूप में देखा जाएगा, जिसमें यह ध्यान आकर्षित होगा कि लागत एविएशन इंडस्ट्री (Aviation Industry) पर कैसे डाली जाएगी।
