परमाणु ऊर्जा में नई रणनीति: SMRs पर फोकस
भारत अब पारंपरिक बड़े रिएक्टरों से हटकर एक अधिक वितरित और विस्तार योग्य (scalable) मॉडल की ओर बढ़ रहा है। BSMR-200 का मानकीकृत (standardized) डिज़ाइन देश की परमाणु ऊर्जा क्षमता का विस्तार करने और राष्ट्रीय ऊर्जा सुरक्षा व जलवायु प्रतिबद्धताओं को पूरा करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा, साथ ही स्वदेशी तकनीक के विकास को भी बढ़ावा देगा।
BSMR-200 की लागत और समय-सीमा
योजनाबद्ध 220 MWe BSMR-200 रिएक्टर के लिए टेंडर भारत के परमाणु रोडमैप का एक अहम हिस्सा है। इसके मानकीकृत डिज़ाइन को बड़े पैमाने पर उत्पादन (mass production) और तेज प्रोजेक्ट टाइमलाइन के लिए तैयार किया गया है, जो भारत को 2047 तक 100 GW के अपने परमाणु क्षमता लक्ष्य तक पहुंचने में मदद करेगा। BSMR-200 के विकास और निर्माण में लगभग ₹5,960 करोड़ की लागत आने का अनुमान है, जिसमें पायलट प्रोजेक्ट्स की लागत प्रति मेगावाट लगभग ₹30 करोड़ होगी। इस पहल को न्यूक्लियर एनर्जी मिशन (Nuclear Energy Mission) द्वारा वित्त पोषित किया जा रहा है, जिसे 2025-26 के फाइनेंशियल ईयर में SMR अनुसंधान के लिए ₹20,000 करोड़ का बजट आवंटित किया गया था। मंजूरी के बाद निर्माण में पारंपरिक बड़े रिएक्टरों की तुलना में तेज गति से 60 से 72 महीनों का समय लगने की उम्मीद है।
पॉलिसी सपोर्ट और ग्लोबल पोजीशन
भारत का SMRs को अपनाना 'सस्टेनेबल हार्नेसिंग एंड एडवांस्डमेंट ऑफ न्यूक्लियर एनर्जी फॉर ट्रांसफॉर्मिंग इंडिया' (SHANTI) एक्ट, जो दिसंबर 2025 में पारित हुआ, से और मजबूत हुआ है। यह कानून राज्य के एकाधिकार को समाप्त करता है, जिससे निजी और विदेशी कंपनियां नागरिक परमाणु परियोजनाओं में 49% तक इक्विटी (equity) निवेश कर सकती हैं। इसका उद्देश्य निवेश और टेक्नोलॉजी ट्रांसफर को आकर्षित करना है। पश्चिमी SMR कार्यक्रमों के विपरीत, जो लाइट वॉटर रिएक्टर (LWR) तकनीक को अपनाते हैं, भारत स्वदेशी प्रेशराइज्ड हैवी वाटर रिएक्टर (PHWR)-आधारित SMR डिज़ाइन विकसित कर रहा है, जो तकनीकी स्वतंत्रता की ओर एक मार्ग प्रशस्त करता है। भारत का अनुमान है कि उसके SMRs की निर्माण लागत ₹30 करोड़ प्रति MW जितनी कम हो सकती है, जो वैश्विक प्रतिस्पर्धियों की ₹50 करोड़ से ₹100 करोड़ प्रति MW की लागत से 30% तक सस्ती हो सकती है। यह रणनीति 100 GW के लक्ष्य को पूरा करने के लिए महत्वपूर्ण है, जिसके लिए सालाना लगभग 4.14 GW क्षमता जोड़ने की आवश्यकता है। भारत औद्योगिक डीकार्बोनाइजेशन, हाइड्रोजन उत्पादन और डेटा सेंटरों को बिजली देने के लिए भी SMRs विकसित कर रहा है।
आर्थिक और तकनीकी चुनौतियाँ
भारत के SMR कार्यक्रम की लागत-प्रभावशीलता (cost-effectiveness) बड़े ऑर्डर वॉल्यूम को सुरक्षित करने पर बहुत अधिक निर्भर करती है, ताकि सामान्य सिस्टम लागतों को छोटी क्षमता में फैलाया जा सके। विशेषज्ञ मानते हैं कि विस्तारयोग्यता (scalability) आर्थिक व्यवहार्यता (economic viability) के लिए महत्वपूर्ण है। हालांकि SHANTI Act ने इस क्षेत्र को उदार बनाया है, इसके नियमों और विनियमों का पूरा कार्यान्वयन अभी बाकी है, जिससे कुछ रेगुलेटरी अनिश्चितता बनी हुई है। स्वदेशी PHWR-आधारित SMR डिज़ाइन पर निर्भरता का मतलब है कि भारत स्थापित पश्चिमी LWR कार्यक्रमों के विपरीत, एक नए व्यावसायिक क्षेत्र में प्रवेश कर रहा है। भू-राजनीतिक कारक, जैसे दुर्लभ पृथ्वी (rare earth) और यूरेनियम प्रसंस्करण में चीन का प्रभुत्व, निर्भरता के जोखिम भी पैदा कर सकते हैं। परमाणु कचरे का दीर्घकालिक प्रबंधन और अधिक बार रिएक्टर प्रतिस्थापन से संभावित पर्यावरणीय जोखिमों पर सावधानीपूर्वक ध्यान देने की आवश्यकता है।
भविष्य का SMR रोडमैप
भारत की योजना 2033 तक कम से कम पांच स्वदेशी SMRs विकसित करने की है, जिसमें BSMR-200, SMR-55 और हाइड्रोजन के लिए हाई-टेम्परेचर गैस-कूल्ड रिएक्टर (HTGCR) शामिल हैं। इस सफलता के लिए निरंतर सरकारी समर्थन, मजबूत निजी क्षेत्र की भागीदारी और एक मजबूत घरेलू विनिर्माण आधार का निर्माण महत्वपूर्ण है। सरकार की प्रतिबद्धता 2070 तक नेट जीरो (Net Zero) लक्ष्य को पूरा करने और ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करने की है, जिससे भारत एक प्रमुख परमाणु ऊर्जा उपभोक्ता होने के साथ-साथ परमाणु प्रौद्योगिकी का निर्यातक भी बन सके।