भारत ने प्राइवेट कंपनियों कोproven foreign nuclear technology का इस्तेमाल करने की अनुमति देने वाले ड्राफ्ट दिशानिर्देश जारी किए हैं, जो दिसंबर 2025 के SHANTI Act के बाद आया है। निवेशकों को सख्त नियामक निगरानी और उच्च पूंजीगत जरूरतों पर ध्यान देना चाहिए, जो पावर सेक्टर के प्रतिभागियों की लंबी अवधि की वित्तीय समय-सीमा को प्रभावित कर सकती हैं।
भारत सरकार ने परमाणु ऊर्जा क्षेत्र में निजी भागीदारी के लिए ड्राफ्ट नियमों को आधिकारिक तौर पर जारी कर दिया है, जो देश की ऊर्जा नीति में एक बड़ा बदलाव का संकेत है। 14 अगस्त 2026 को की गई यह घोषणा, दिसंबर 2025 में पारित SHANTI Act (Sustainable Harnessing and Advancement of Nuclear Energy for Transforming India) द्वारा स्थापित विधायी ढांचे पर आधारित है।
###proven Technology की अनिवार्यता
ड्राफ्ट नियमों में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि निजी डेवलपर्स द्वारा उपयोग किए जाने वाले किसी भी विदेशी रिएक्टर डिजाइन का अन्य देशों में सुरक्षित संचालन का proven track record होना चाहिए। इस शर्त का उद्देश्य सुरक्षा और विश्वसनीयता सुनिश्चित करना है। निवेशकों के लिए, यह आवश्यकता भागीदारों और प्रौद्योगिकी प्रदाताओं की पसंद को स्थापित वैश्विक संस्थाओं तक सीमित करती है, जो भारत के परमाणु विस्तार के शुरुआती चरणों में प्रायोगिक या अप्रमाणित रिएक्टर डिजाइनों के दायरे को सीमित कर सकती है।
कड़ा नियामक नियंत्रण
इन नए नियमों का एक महत्वपूर्ण पहलू एटॉमिक एनर्जी रेगुलेटरी बोर्ड (Atomic Energy Regulatory Board) को दी गई शक्ति है। नियामक को निर्माण, कंपोनेंट इंस्टॉलेशन और ईंधन लोडिंग सहित प्रमुख विकास चरणों में परियोजनाओं को रोकने का अधिकार है। जबकि यह निगरानी सार्वजनिक सुरक्षा को प्राथमिकता देने के इरादे से की जाती है, यह निजी डेवलपर्स के लिए महत्वपूर्ण निष्पादन जोखिम पैदा करती है। किसी भी नियामक हस्तक्षेप से समय और लागत में भारी वृद्धि हो सकती है, जो लंबी अवधि की परियोजनाओं के वित्तीय स्वास्थ्य और निवेश पर रिटर्न को प्रभावित करने वाले महत्वपूर्ण कारक हैं।
वित्तीय और परिचालन चुनौतियाँ
2047 तक 100 GW परमाणु क्षमता तक पहुंचने के सरकारी लक्ष्य के लिए अनुमानित $210 बिलियन के निवेश की आवश्यकता है। यह पूंजीगत व्यय का स्तर बहुत बड़ा है और इस क्षेत्र में प्रवेश करने वाली कंपनियों की बैलेंस शीट के लिए एक चुनौती पेश करेगा। सौर या पवन परियोजनाओं के विपरीत, परमाणु संयंत्रों में निर्माण चरण अत्यंत लंबा होता है, जो भाग लेने वाली कंपनियों के ऋण-इक्विटी अनुपात और लाभ मार्जिन पर दबाव डाल सकता है।
इसके अलावा, भारतीय बाजार में वर्तमान में विशेष परमाणु बीमा उत्पादों की कमी है, जो देनदारियों के प्रबंधन के लिए आवश्यक हैं। अंतरराष्ट्रीय प्रौद्योगिकी प्रदाताओं और घरेलू कंपनियों को इन देयता व्यवस्थाओं को नेविगेट करने और स्थिर दीर्घकालिक ऑफटेक समझौतों को सुरक्षित करने में चुनौतियों का सामना करना पड़ेगा। बीमा और देयता के लिए स्पष्ट समाधानों के बिना, वित्तीय जोखिम एक बड़ी बाधा बना हुआ है।
निवेशकों को इन नियमों के अंतिम रूप, भारतीय फर्मों और विदेशी प्रौद्योगिकी भागीदारों के बीच संयुक्त उद्यमों की विशिष्ट संरचना, और ऐसी भारी पूंजीगत आवश्यकताओं का समर्थन करने के लिए वित्तीय तंत्र के विकास पर नज़र रखनी चाहिए। परियोजना अनुमोदन की गति आने वाले वर्षों में निजी परमाणु ऊर्जा की वास्तविक विकास क्षमता का आकलन करने के लिए प्राथमिक निगरानी योग्य होगी।
