भारत सरकार ने फ्लोटिंग सोलर एनर्जी के लिए 102 GWp की ज़बरदस्त क्षमता पहचानी है, जो मौजूदा 1 GW से काफी ज़्यादा है। नई पॉलिसी और फाइनेंसियल सपोर्ट के साथ, यह सेक्टर ज़मीन पर लगने वाले सोलर प्रोजेक्ट्स पर निर्भरता कम कर सकता है। निवेशकों को यह देखना होगा कि फ्लोटिंग सोलर, जिसमें ज़मीन पर लगने वाले प्रोजेक्ट्स की तुलना में शुरुआती लागत और तकनीकी चुनौतियां ज़्यादा होती हैं, कैसे प्रोजेक्ट एग्जीक्यूशन को बदलेगा।
क्या हुआ?
नेशनल इंस्टिट्यूट ऑफ सोलर एनर्जी (NISE) की एक रिपोर्ट के मुताबिक, भारत ने फ्लोटिंग सोलर एनर्जी के लिए 102 गीगावाट-पीक (GWp) की विशाल क्षमता की पहचान की है। जहां भारत की कुल सोलर क्षमता लगभग 158 GW है, वहीं फ्लोटिंग सोलर प्रोजेक्ट्स से केवल 600 मेगावाट (MW) क्षमता ही जुड़ी है। इस रिपोर्ट में देश भर में 682 तकनीकी रूप से संभव जल निकायों का उल्लेख किया गया है। इसका मकसद ज़मीन-आधारित सोलर इंस्टॉलेशन से आगे बढ़कर स्वच्छ ऊर्जा की ओर तेज़ी से बढ़ना है। सरकार अब फाइनेंस मिनिस्ट्री के साथ मिलकर इस टेक्नोलॉजी को बड़े पैमाने पर लागू करने के लिए समर्पित नीतियां और फाइनेंसियल स्कीमें लाने पर चर्चा कर रही है।
सेक्टर के लिए रणनीतिक महत्व
फ्लोटिंग सोलर प्रोजेक्ट्स, जिन्हें 'फ्लोटोवोल्टाइक्स' भी कहा जाता है, भारत के रिन्यूएबल एनर्जी सेक्टर के लिए रणनीति में एक बड़ा बदलाव लाते हैं। पारंपरिक ग्राउंड-माउंटेड सोलर प्लांट्स के लिए ज़मीन के बड़े टुकड़ों की ज़रूरत होती है, जो शहरी और औद्योगिक इलाकों में दुर्लभ और महंगी होती जा रही है। जलाशयों, झीलों और बांधों की सतहों का उपयोग करके, डेवलपर्स ज़मीन अधिग्रहण की बाधाओं को दूर कर सकते हैं। इसके अलावा, फ्लोटिंग सोलर का दोहरा फायदा है: पानी की सतह पैनलों को ठंडा करती है, जिससे गर्म, सूखी ज़मीन की तुलना में एनर्जी एफिशिएंसी 5-15% तक बढ़ सकती है। साथ ही, इन जल निकायों को ढकने से पानी का वाष्पीकरण काफी कम हो सकता है, जो सूखे से प्रभावित क्षेत्रों में सिंचाई और नगर निगम के जल आपूर्ति के लिए एक बड़ा लाभ है।
लागत और तकनीकी वास्तविकता
निवेशकों के लिए यह समझना ज़रूरी है कि फ्लोटिंग सोलर, स्टैंडर्ड सोलर पार्कों से स्ट्रक्चरली अलग है। इन प्रोजेक्ट्स के लिए खास फ्लोटिंग प्लेटफॉर्म (पोंटून), एंकरिंग सिस्टम और वाटरप्रूफ केबलिंग की ज़रूरत होती है, जिससे कंस्ट्रक्शन (CAPEX) पर शुरुआती खर्च बढ़ जाता है। ऐतिहासिक रूप से, फ्लोटिंग सोलर लगाना ग्राउंड-माउंटेड सिस्टम की तुलना में ज़्यादा महंगा रहा है। हालांकि, हाइड्रोपावर और थर्मल प्लांट के जलाशयों में मौजूदा ग्रिड इंफ्रास्ट्रक्चर का उपयोग करने की क्षमता कुछ लागतों को कम करने में मदद करती है। टाटा पावर, एसजेवीएन (SJVN), एनएचपीसी (NHPC) और एनटीपीसी (NTPC) जैसी कंपनियां शुरुआती प्रोजेक्ट्स के साथ पहले से ही इस क्षेत्र में प्रयोग कर रही हैं। ये कंपनियां तकनीकी जटिलताओं के प्रबंधन में अनुभव प्राप्त कर रही हैं, जैसे कि यह सुनिश्चित करना कि पैनल पानी की धाराओं, लहरों की हलचल और जलीय वातावरण की संक्षारक प्रकृति का सामना कर सकें।
जोखिम और एग्जीक्यूशन चुनौतियां
हालांकि 102 GWp का आंकड़ा बड़े विकास का संकेत देता है, लेकिन संभावनाओं को हकीकत में बदलने में बाधाएं हैं। फ्लोटिंग पैनलों का रखरखाव ज़मीन पर लगे पैनलों की तुलना में अधिक जटिल है, क्योंकि नियमित जांच के लिए नावों या विशेष रोबोटिक सिस्टम की ज़रूरत होती है। जलीय पारिस्थितिक तंत्र पर संभावित प्रभाव भी पड़ सकता है; जल निकाय के बड़े हिस्सों को ढकने से सूर्य के प्रकाश के प्रवेश और ऑक्सीजन के स्तर में बदलाव आ सकता है, जिसे रेगुलेटरी जांच या पर्यावरणीय विरोध का सामना करना पड़ सकता है। इसके अलावा, जलाशयों में प्रोजेक्ट्स को पानी के स्तर में उतार-चढ़ाव का हिसाब रखना होगा, जिसका मतलब है कि एंकरिंग सिस्टम को मौसमी मानसून परिवर्तनों को संभालने के लिए पर्याप्त मजबूत होना चाहिए, ताकि पैनलों या बुनियादी ढांचे को नुकसान न पहुंचे। निवेशकों को यह मानने में सतर्क रहना चाहिए कि इन प्रोजेक्ट्स का प्रॉफिट मार्जिन पारंपरिक सोलर पार्कों जैसा होगा, जब तक कि दीर्घकालिक रखरखाव लागत और टिकाऊपन पर अधिक बड़े पैमाने पर डेटा उपलब्ध न हो जाए।
निवेशक क्या ट्रैक करें?
आगे बढ़ते हुए, सबसे महत्वपूर्ण बात सरकार द्वारा घोषित की जाने वाली विशिष्ट नीतियों और वित्तीय प्रोत्साहनों पर नज़र रखना होगा। निवेशकों को कैपिटल सब्सिडी, इंटरेस्ट सबवेंशन स्कीमों या प्रोडक्शन-लिंक्ड इंसेंटिव (PLI) पर अपडेट की तलाश करनी चाहिए, जो फ्लोटिंग और ग्राउंड-माउंटेड सोलर के बीच लागत के अंतर को पाट सकें। प्रमुख पावर यूटिलिटीज और रिन्यूएबल एनर्जी डेवलपर्स की प्रोजेक्ट पाइपलाइन की निगरानी करना यह देखने के लिए आवश्यक होगा कि वे पायलट प्रोजेक्ट्स से बड़े पैमाने पर संचालन में कितनी तेज़ी से आगे बढ़ते हैं। इसके अतिरिक्त, मौजूदा फ्लोटिंग प्रोजेक्ट्स की कमीशनिंग समय-सीमा और परिचालन प्रदर्शन को ट्रैक करने से यह स्पष्टता मिलेगी कि क्या यह सेक्टर उद्योग विशेषज्ञों द्वारा अनुमानित दीर्घकालिक दक्षता लाभ प्राप्त कर सकता है।
