मिडिल ईस्ट संकट का असर: भारत ने रूसी तेल पर बढ़ाया दांव, एनर्जी सिक्योरिटी के लिए बड़ी डील

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AuthorAditi Chauhan|Published at:
मिडिल ईस्ट संकट का असर: भारत ने रूसी तेल पर बढ़ाया दांव, एनर्जी सिक्योरिटी के लिए बड़ी डील
Overview

मिडिल ईस्ट में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव और होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) में सप्लाई की बाधाओं के चलते, भारत ने अपनी एनर्जी सिक्योरिटी को मजबूत करने के लिए एक बड़ा कदम उठाया है। देश की रिफाइनरीज ने अप्रैल में डिलीवरी के लिए करीब **60 मिलियन बैरल** रूसी कच्चा तेल (Crude Oil) खरीदने का सौदा किया है। यह कदम वैश्विक अस्थिरता के बीच ऊर्जा की आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए एक रणनीतिक कदम है।

एनर्जी सप्लाई पर मंडराया संकट, भारत की बदली रणनीति

मिडिल ईस्ट में चल रहे संघर्ष ने ग्लोबल ऑयल मार्केट में अब तक का सबसे बड़ा सप्लाई शॉक पैदा कर दिया है। होर्मुज जलडमरूमध्य, जो दुनिया के 20% ऑयल ट्रेड का अहम जरिया है, के बंद होने का खतरा मंडरा रहा है। ऐसे में खाड़ी देशों ने अपनी प्रोडक्शन में रोजाना कम से कम 10 मिलियन बैरल की कटौती की है। इस स्थिति ने ब्रेंट क्रूड (Brent Crude) की कीमतों को कई बार $100 प्रति बैरल के पार पहुंचा दिया है, और लगातार बने भू-राजनीतिक जोखिमों के चलते आगे भी कीमतों में तेजी की आशंका है। भारत, जो अपना 40% कच्चा तेल इसी रास्ते से आयात करता है, इस संकट के प्रति विशेष रूप से संवेदनशील है।

रूसी और वेनेजुएला के तेल पर भारत का भरोसा

इन चुनौतियों का सामना करने के लिए, मंगलौर रिफाइनरी एंड पेट्रोकेमिकल्स लिमिटेड (Mangalore Refinery & Petrochemicals Ltd.) और हिंदुस्तान मित्तल एनर्जी लिमिटेड (Hindustan Mittal Energy Ltd.) जैसी प्रमुख इंडियन रिफाइनरीज एक बार फिर रूसी कच्चा तेल खरीद रही हैं। इन डील्स में ब्रेंट क्रूड पर $5 से $15 प्रति बैरल का प्रीमियम दिया जा रहा है, जो बाजार में उपलब्ध तेल की fuerte मांग को दर्शाता है। भारत वेनेजुएला से भी अपने आयात को बढ़ा रहा है, और अप्रैल के लिए 8 मिलियन बैरल की उम्मीद है, जो अक्टूबर 2020 के बाद सबसे बड़ा वॉल्यूम होगा।

अमेरिकी वेवर और जी7 नियमों के बीच रूस की भूमिका

यह कदम भारत के लिए एक महत्वपूर्ण बदलाव है, क्योंकि पहले अमेरिकी दबाव में रूसी तेल के आयात को कम कर दिया गया था। हालांकि, भू-राजनीतिक चुनौतियों और G7 देशों के प्राइस कैप (Price Cap) नियमों के बावजूद, रूस भारत के लिए एक अहम सप्लायर बना हुआ है। हाल ही में अमेरिकी ट्रेजरी (U.S. Treasury) से मिले वेवर (Waivers) ने इस स्थिति को और सरल बना दिया है। वेनेजुएला से भी प्रतिबंधों में ढील के बाद आयात बढ़ा है।

नई सप्लाई डील्स में जोखिम और चुनौतियां

हालांकि, इस नई रणनीति में कुछ जोखिम भी शामिल हैं। रूसी तेल के लिए अमेरिकी वेवर पर निर्भरता, भू-राजनीतिक बदलावों या सेकेंडरी सैंक्शन (Secondary Sanctions) के कारण बदल सकती है। रूस की लॉन्ग-टर्म रिलायबिलिटी (Long-term Reliability) भी सवालों के घेरे में है, क्योंकि यूक्रेन के हमलों से उसके इंफ्रास्ट्रक्चर (Infrastructure) को खतरा है और सैंक्शन उसके एक्सपोर्ट कैपेबिलिटीज (Export Capabilities) को प्रभावित कर रहे हैं। एशियाई रिफाइनरीज के लिए मध्य पूर्व के कच्चे तेल को बदलने में तकनीकी दिक्कतें भी आ रही हैं। कई रिफाइनरियां मीडियम-सौर क्रूड (medium-sour crudes) के लिए बनी हैं, और अमेरिका या अफ्रीका से तेल मंगवाने में लंबी शिपिंग टाइम, ज्यादा फ्रेट कॉस्ट (Freight Costs) और ब्लेंडिंग (Blending) व प्रोसेसिंग (Processing) में जटिलताएं शामिल हैं। इससे खाड़ी क्षेत्र के तेल को तुरंत बदलना मुश्किल हो रहा है।

ऑयल प्राइस का अनुमान और भारत की भविष्य की योजनाएं

ऑयल प्राइस (Oil Price) के अनुमानों में काफी मतभेद है। एनालिस्ट्स (Analysts) 2026 तक ब्रेंट क्रूड को $60 से $105 प्रति बैरल के बीच कारोबार करने की उम्मीद कर रहे हैं, जो मिडिल ईस्ट संघर्ष पर निर्भर करेगा। वहीं, कुछ का अनुमान है कि यह $95/bbl से ऊपर बना रहेगा। लंबी अवधि में, भारत अपनी एनर्जी सिक्योरिटी (Energy Security) के लिए रिफाइनिंग क्षमता बढ़ाने, नए स्ट्रेटेजिक रिजर्व (Strategic Reserves) बनाने और इथेनॉल ब्लेंडिंग (Ethanol Blending) व इलेक्ट्रिक व्हीकल्स (Electric Vehicles) को बढ़ावा देने की योजना बना रहा है, लेकिन जीवाश्म ईंधन (Fossil Fuels) आने वाले कई सालों तक केंद्रीय बने रहेंगे।

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