Solar Cell Rules में भारत का बड़ा दांव: मॉड्यूल बनाने वाली कंपनियों पर क्या होगा असर?

ENERGY
Whalesbook Logo
AuthorAditi Chauhan|Published at:
Solar Cell Rules में भारत का बड़ा दांव: मॉड्यूल बनाने वाली कंपनियों पर क्या होगा असर?

भारत सरकार ने इंपोर्टेड सोलर सेल के इस्तेमाल पर बड़ा फैसला लिया है। जनवरी 2027 से नए रिन्यूएबल प्रोजेक्ट्स में अब सिर्फ डोमेस्टिक (घरेलू) सोलर सेल का इस्तेमाल होगा। इस फैसले से उन कंपनियों की कमाई पर असर पड़ सकता है, जो इंपोर्टेड सेल का इस्तेमाल कर या बनाकर बेचकर मोटा मुनाफा कमा रही थीं।

Detailed Coverage

इंपोर्टेड सोलर सेल पर लगेगा फुल स्टॉप

भारत के सोलर मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में एक बड़ा पॉलिसी चेंज आया है। सरकार ने नए रिन्यूएबल एनर्जी प्रोजेक्ट्स के लिए डोमेस्टिक सोलर सेल के इस्तेमाल को अनिवार्य कर दिया है। इसका मकसद इंपोर्ट पर निर्भरता कम करना और लोकल सप्लाई चेन को मजबूत बनाना है। यह पॉलिसी उन कंपनियों के लिए खास मायने रखती है जो सोलर मॉड्यूल बनाने के साथ-साथ खुद के सोलर सेल भी बनाती हैं।

"सेल आर्बिट्रेज" का खत्म होता दौर

पहले, इंटीग्रेटेड सोलर कंपनियां (जो मॉड्यूल और सेल दोनों बनाती हैं) डबल फायदा उठा रही थीं। वे अपनी जरूरत के लिए डोमेस्टिक सेल का इस्तेमाल करती थीं और बची हुई अतिरिक्त डोमेस्टिक सेल को उन मॉड्यूल-ओनली मैन्युफैक्चरर्स को बेच देती थीं, जिनके पास सेल बनाने की सुविधा नहीं थी। चूंकि डोमेस्टिक कंटेंट रिक्वायरमेंट (DCR) वाले प्रोजेक्ट्स, जो सरकारी सब्सिडी के हकदार होते हैं, के लिए डोमेस्टिक सेल जरूरी हैं, इसलिए इनकी कीमत इंपोर्टेड सेल से ज्यादा होती थी। इंडस्ट्री के आंकड़े बताते हैं कि डोमेस्टिक सेल बेचने से मिलने वाला प्रॉफिट मार्जिन (EBITDA per watt-peak) अकेले DCR-कंप्लायंट मॉड्यूल बेचने की तुलना में लगभग 14% से 15% ज्यादा था। अब सरकार के नए नियमों से यह सेकेंडरी रेवेन्यू स्ट्रीम सिकुड़ने की उम्मीद है।

कैपेसिटी का गैप और कीमतों का फासला

फिलहाल, भारत की सोलर असेंबली कैपेसिटी और डोमेस्टिक सेल प्रोडक्शन कैपेसिटी के बीच बड़ा अंतर है। इंडस्ट्री के लेटेस्ट अनुमानों के मुताबिक, जहां मॉड्यूल असेंबली कैपेसिटी करीब 210 गीगावाट तक पहुंच गई है, वहीं डोमेस्टिक सेल प्रोडक्शन कैपेसिटी सिर्फ 30 गीगावाट से थोड़ी ज्यादा है। इस असंतुलन के कारण कीमतों में भारी अंतर आ गया है। उदाहरण के लिए, DCR-कंप्लायंट मॉड्यूल, जिनमें लोकल सेल का इस्तेमाल जरूरी है, की कीमत हाल ही में लगभग ₹21-22 प्रति वॉट थी। वहीं, नॉन-DCR पैनल, जिनमें अक्सर इंपोर्टेड सेल का इस्तेमाल होता है, की कीमत लगभग ₹15-16 प्रति वॉट है। DCR मॉड्यूल की यह हाई प्राइस इंटीग्रेटेड प्लेयर्स को अच्छा मार्जिन बनाए रखने में मदद कर रही थी, लेकिन अब इस पॉलिसी से इंडस्ट्री को सब्सिडाइज्ड प्रोजेक्ट्स की कुल डिमांड को पूरा करने के लिए डोमेस्टिक सेल प्रोडक्शन को तेजी से बढ़ाना होगा।

डेडलाइन और फ्यूचर प्रोजेक्ट्स पर असर

सरकार ने इस बदलाव के लिए एक सख्त डेडलाइन तय की है। अगस्त 2025 के बाद बिड किए गए सरकारी प्रोजेक्ट्स पहले से ही इस नियम के दायरे में हैं। वहीं, नेट-मीटरिंग और ओपन एक्सेस प्रोजेक्ट्स सहित प्राइवेट इंस्टॉलेशन को इस साल के अंत तक कंप्लायंट होना होगा। 1 जनवरी 2027 तक, सभी संबंधित प्रोजेक्ट्स के लिए डोमेस्टिक सेल का इस्तेमाल अनिवार्य हो जाएगा। इससे उन कंपनियों के लिए समय कम बच रहा है जो इंपोर्टेड और डोमेस्टिक सेल के बीच के प्राइस डिफरेंस पर निर्भर थीं। निवेशकों को यह देखना होगा कि ये मैन्युफैक्चरर्स डोमेस्टिक सेल के फुल इस्तेमाल में कैसे ट्रांजिशन करते हैं। इन कंपनियों के लिए सबसे बड़ी चुनौती अपनी सेल मैन्युफैक्चरिंग प्लांट्स को तेजी से बढ़ाना होगी, ताकि वे प्रतिद्वंद्वियों को सेल बेचने से होने वाले घाटे की भरपाई कर सकें। लॉन्ग-टर्म फाइनेंशियल इम्पैक्ट इस बात पर निर्भर करेगा कि क्या डोमेस्टिक मॉड्यूल की कुल डिमांड, सेल बेचने से मिलने वाले प्रीमियम के नुकसान की भरपाई कर पाती है या नहीं।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.