देश के पावर सेक्टर में कोयले का संकट गहरा गया है। करीब **80** थर्मल पावर प्लांट्स में कोयले का स्टॉक खतरनाक स्तर से नीचे है। भारी डिमांड और कमजोर मॉनसून के कारण सरकार को कैप्टिव प्लांट्स के लिए सख्त निर्देश जारी करने पड़े हैं।
संकट की गंभीरता
देश में बिजली की मांग रिकॉर्ड स्तर पर है। सितंबर 2026 में पीक पावर डिमांड 269 GW तक पहुंच गई है, जो अपने आप में एक बड़ी चुनौती है। मौजूदा हालात यह हैं कि 190 में से 80 थर्मल प्लांट्स के पास 25% से भी कम कोयले का स्टॉक बचा है, जिसे क्रिटिकल कैटेगरी में रखा गया है।
सरकार का कड़ा कदम
कमजोर मॉनसून के कारण हाइड्रो पावर जनरेशन में 12% की बड़ी गिरावट आई है, जिसने ग्रिड पर दबाव और बढ़ा दिया है। इस स्थिति से निपटने के लिए मिनिस्ट्री ऑफ पावर ने Electricity Act के Section 11 को लागू कर दिया है। इसके तहत, कैप्टिव कोल-बेस्ड पावर जनरेटर्स को 31 दिसंबर 2026 तक अपनी पूरी क्षमता से बिजली बनाने और अतिरिक्त बिजली ग्रिड को सप्लाई करने का निर्देश दिया गया है।
Coal India और मार्केट का रिएक्शन
सबसे बड़ी कोल प्रोड्यूसर कंपनी Coal India Ltd. ने सितंबर 2026 में सप्लाई में 12.5% का इजाफा करते हुए 61.20 मिलियन टन कोयला भेजा है। इसके बावजूद लॉजिस्टिक्स की दिक्कतों के कारण इन्वेंट्री गैप बना हुआ है। इसका असर शेयर बाजार में भी दिखा और 6 अक्टूबर 2026 को Coal India Ltd. के शेयर 3.16% टूटकर ₹411.65 पर बंद हुए।
डिस्काम्स पर दबाव
इस बिजली संकट का सीधा असर डिस्काम्स (Discoms) की बैलेंस शीट पर पड़ रहा है। जब स्थानीय बिजली उत्पादन मांग को पूरा नहीं कर पाता, तो उन्हें पावर एक्सचेंज से महंगी बिजली खरीदनी पड़ती है। एक्सचेंज पर कीमतों में उतार-चढ़ाव बढ़ने से इन कंपनियों के मार्जिन पर दबाव बढ़ सकता है। निवेशक अब नजरें बनाए हुए हैं कि कोयले की आपूर्ति और सरकारी निर्देश ग्रिड को कितनी जल्दी स्टेबल कर पाते हैं।
