सरकार ने कोल गैसीफिकेशन को बढ़ावा देने का मास्टर प्लान तैयार किया है। इस पहल के जरिए अगले सात सालों में **₹1.5 लाख करोड़** की विदेशी मुद्रा बचाने का लक्ष्य है। इस प्रोजेक्ट को सफल बनाने के लिए सरकार **₹46,000 करोड़** के इंसेंटिव्स देने जा रही है।
भारत अब कोयले को केवल ईंधन के तौर पर नहीं, बल्कि कच्चे माल के रूप में इस्तेमाल करने की तैयारी कर रहा है। सरकार की नई रणनीति के तहत कोयले को गैसीफाई करके मेथनॉल, इथेनॉल और अमोनियम नाइट्रेट जैसे महत्वपूर्ण केमिकल्स देश में ही बनाए जाएंगे। इसका सीधा उद्देश्य इन चीजों के महंगे आयात पर लगाम लगाना है।
वित्तीय सहायता और पॉलिसी का दम
कोल मिनिस्ट्री ने प्राइवेट और सरकारी कंपनियों के लिए ₹46,000 करोड़ का भारी-भरकम इंसेंटिव पैकेज पेश किया है। इस पॉलिसी के तहत प्लांट और मशीनरी की लागत का 20% तक इंसेंटिव दिया जाएगा। सबसे बड़ा बदलाव यह है कि अब गैस प्रोजेक्ट्स के लिए कोल लिंकेज का कार्यकाल बढ़ाकर 30 साल कर दिया गया है, जिससे कंपनियों को लंबे समय तक ईंधन की चिंता नहीं रहेगी। सरकार ने 2030 तक 100 मिलियन टन सालाना कोल गैसीफिकेशन क्षमता हासिल करने का लक्ष्य रखा है।
बड़ी कंपनियों की चांदी?
इस सेक्टर में कई दिग्गज कंपनियां दांव लगा रही हैं। इसमें Coal India Ltd, NTPC, Jindal Steel और Adani Group प्रमुख हैं। गैसीफिकेशन के जरिए ये कंपनियां न सिर्फ वैश्विक ऊर्जा कीमतों में उतार-चढ़ाव से खुद को बचा पाएंगी, बल्कि अपने कार्बन फुटप्रिंट को भी मैनेज कर सकेंगी।
निवेशकों के लिए चेतावनी (Monitorables)
हालांकि यह प्लान शानदार दिख रहा है, लेकिन इसमें चुनौतियां भी कम नहीं हैं। गैसीफिकेशन तकनीक काफी जटिल और महंगी है। विदेशी टेक्नोलॉजी पर निर्भरता लागत बढ़ा सकती है। इसके अलावा, जमीन अधिग्रहण और पर्यावरण संबंधी मंजूरियां प्रोजेक्ट्स में देरी का कारण बन सकती हैं। निवेशकों को ध्यान रखना चाहिए कि क्या कंपनियां भविष्य में अपने प्रोडक्ट्स के लिए अच्छी ऑफ-टेक (Off-take) एग्रीमेंट्स कर पाती हैं या नहीं, क्योंकि अंततः मुनाफा डिमांड पर ही टिका होगा।
