India Offshore Oil Output: $4 अरब डॉलर निवेश का लक्ष्य, इम्पोर्ट बिल घटाने की तैयारी

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AuthorAditya Rao|Published at:
India Offshore Oil Output: $4 अरब डॉलर निवेश का लक्ष्य, इम्पोर्ट बिल घटाने की तैयारी

भारत अपनी ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करने और आयात पर निर्भरता कम करने के लिए एक बड़ा कदम उठा रहा है। सरकार **$4 अरब डॉलर** तक का निवेश जुटाकर Offshore (समुद्र के अंदर) तेल और गैस की खोज को तेज करने की योजना बना रही है। इसका मुख्य मकसद देश के **$60 अरब डॉलर** के एनर्जी इम्पोर्ट बिल को कम करना है।

डीपवॉटर में छिपे खजाने को निकालने की कोशिश

Directorate General of Hydrocarbons (DGH) का अनुमान है कि भारत के पास लगभग 12 अरब बैरल तेल और गैस के भंडार हैं, जिनमें से बड़ा हिस्सा डीपवॉटर (गहरे समुद्र) वाले इलाकों में है। लेकिन इन विशाल भंडारों को निकालने के लिए भारी निवेश और जोखिम उठाने की क्षमता की ज़रूरत है। डीपवॉटर एक्सप्लोरेशन (exploration) एक महंगा काम है, जहां एक कुएं पर $250 मिलियन (लगभग ₹2,000 करोड़) से ज़्यादा का खर्च आ सकता है। इसी को देखते हुए, सरकार $3-4 अरब डॉलर की पूंजी जुटाने का लक्ष्य रख रही है। एक्सपर्ट्स का मानना है कि इसमें से लगभग 90% 'रिस्क कैपिटल' (जोखिम वाली पूंजी) होगी, यानी इस प्रोजेक्ट की सफलता भूवैज्ञानिक डेटा की सटीकता और विदेशी एक्सप्लोरेशन कंपनियों को दिए जाने वाले टैक्स इंसेंटिव पर निर्भर करेगी।

मॉडर्न टेक्नोलॉजी और बेहतर इंफ्रास्ट्रक्चर पर फोकस

पुरानी 2D मैपिंग तकनीकों को छोड़कर, अब 3D सीस्मिक सर्वे (seismic survey) पर ज़ोर दिया जा रहा है ताकि तेल वाले इलाकों की बेहतर पहचान हो सके। सरकार का मानना है कि नीलामी से पहले ब्लॉकों के जोखिम को कम करके, ज्यादा बिडर्स को आकर्षित किया जा सकता है और असफल कुओं की संख्या को कम किया जा सकता है। डेटा के अलावा, इन अभियानों की सफलता के लिए स्पेशलाइज्ड सर्विस इकोसिस्टम (specialized services ecosystem) की भी ज़रूरत होगी, जिसमें ऑफशोर ड्रिलिंग कॉन्ट्रैक्टर (offshore drilling contractors) और जटिल समुद्री प्रोजेक्ट्स को संभालने वाली इंजीनियरिंग फर्म शामिल हैं।

रेगुलेटरी अड़चनों को दूर करने की पहल

ऊर्जा क्षेत्र के लिए एक बड़ी ऐतिहासिक अड़चन यह रही है कि पेट्रोलियम, वित्त, पर्यावरण और रक्षा जैसे विभिन्न सरकारी विभागों से मंज़ूरी मिलने में बहुत समय लगता था। अब इस प्रक्रिया को आसान बनाने के लिए एक सशक्त अंतर-मंत्रालयी टास्क फोर्स (inter-ministerial task force) बनाने पर विचार किया जा रहा है। इस कदम का मकसद यह सुनिश्चित करना है कि प्रोजेक्ट्स में लंबी देरी न हो, जिससे लागत बढ़ जाती है और प्रोजेक्ट्स से मिलने वाला रिटर्न कम हो जाता है। निवेशकों के लिए, सरकार द्वारा एक स्थिर और लंबी अवधि का रेगुलेटरी माहौल प्रदान करने की क्षमता ही यह तय करेगी कि ग्लोबल प्लेयर्स इन ऑफशोर अभियानों में भाग लेंगे या नहीं।

भविष्य में, अगली तेल और गैस ब्लॉक नीलामी के स्ट्रक्चर (structure) और ऑपरेटर्स को दिए जाने वाले खास फिस्कल टर्म्स (fiscal terms) पर फोकस रहेगा। निवेशकों को पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्रालय से प्रस्तावित टास्क फोर्स के गठन और बड़े पैमाने पर सीस्मिक डेटा अधिग्रहण (seismic data acquisition) कार्यक्रमों की शुरुआत के बारे में आने वाले अपडेट्स पर नज़र रखनी चाहिए, क्योंकि ये प्रोजेक्ट एक्टिविटी के शुरुआती संकेत होंगे।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.