भारत अपनी एनर्जी स्ट्रैटेजी में बड़ा बदलाव कर रहा है। LPG आयात पर निर्भरता कम करने के लिए अब सरकार ग्रीन हाइड्रोजन और बैटरी स्टोरेज पर दांव लगा रही है, जिसका सीधा असर सरकारी तेल कंपनियों और निवेशकों पर पड़ेगा।
भारत अपनी लॉन्ग-टर्म एनर्जी सुरक्षा को मजबूत करने के लिए एलपीजी (LPG) के आयात पर अपनी निर्भरता को धीरे-धीरे खत्म करने की योजना बना रहा है। फिलहाल, एलपीजी के भारी आयात से सरकारी खजाने और विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव बना रहता है। अब सरकार का फोकस ग्रीन हाइड्रोजन, एडवांस्ड बैटरी स्टोरेज और एनर्जी एफिशिएंसी पर शिफ्ट हो रहा है।
सरकारी तेल कंपनियों पर नजर
इस बदलाव का सबसे गहरा असर देश की प्रमुख तेल कंपनियों यानी Indian Oil Corporation (IOCL), Bharat Petroleum Corporation (BPCL) और Hindustan Petroleum Corporation (HPCL) पर पड़ने वाला है। चूंकि इन कंपनियों के पास एलपीजी डिस्ट्रीब्यूशन का एक बड़ा नेटवर्क है, इसलिए अब उन्हें अपने बिजनेस मॉडल में बदलाव करना होगा। निवेशकों के लिए यह देखना जरूरी है कि ये कंपनियां कैसे अपने पारंपरिक एलपीजी कारोबार के साथ-साथ ग्रीन एनर्जी इंफ्रास्ट्रक्चर में निवेश का तालमेल बिठाती हैं।
नेशनल ग्रीन हाइड्रोजन मिशन की भूमिका
सरकार ने इस दिशा में ₹19,744 करोड़ के आउटले के साथ 'नेशनल ग्रीन हाइड्रोजन मिशन' की शुरुआत की है। इस मिशन का मकसद देश में ही हाइड्रोजन का उत्पादन बढ़ाना है। इसमें Reliance Industries और Adani Green जैसी बड़ी कंपनियां भी सक्रिय रूप से काम कर रही हैं। हालांकि, बड़ी चुनौती यह है कि ग्रीन हाइड्रोजन को पारंपरिक ईंधन के मुकाबले सस्ता और कमर्शियली वायबल (Viable) कैसे बनाया जाए।
एनर्जी एफिशिएंसी और आगे की राह
सिर्फ सप्लाई ही नहीं, बल्कि डिमांड मैनेजमेंट पर भी जोर दिया जा रहा है। एनर्जी एफिशिएंसी बढ़ाने के लिए इंडस्ट्रियल और रेसिडेंशियल सेक्टर में नई तकनीकों का इस्तेमाल बढ़ाया जा रहा है।
निवेशकों के लिए रिस्क
निवेशकों को यह समझना चाहिए कि यह बदलाव रातों-रात नहीं होगा। ग्रीन हाइड्रोजन और बैटरी तकनीक अभी मैच्योर होने के दौर में हैं और इनकी लागत जीवाश्म ईंधन (Fossil Fuels) की तुलना में अभी भी अधिक है। सरकारी सब्सिडी और प्राइवेट सेक्टर की एग्जीक्यूशन क्षमता ही तय करेगी कि यह एनर्जी ट्रांजिशन निवेशकों के लिए कितना फायदेमंद साबित होता है।
