Brent crude के दाम **$111** के करीब पहुंच गए हैं, जिससे भारत के लिए एनर्जी इम्पोर्ट महंगा हो गया है। सरकार और ऑयल कंपनियों पर बढ़ते दबाव के बीच, घरेलू फ्यूल कीमतों को स्थिर रखने की चुनौती ने निवेशकों की नजरें टिका दी हैं।
दुनिया भर में बढ़ती भू-राजनीतिक तनाव और सप्लाई चेन की बाधाओं के चलते कच्चे तेल की कीमतें लगातार ऊपर चढ़ रही हैं। Brent crude फ्यूचर्स $111 प्रति बैरल के स्तर के आसपास ट्रेड कर रहा है। भारतीय रिफाइनर्स के लिए चुनौती केवल बेस प्राइस ही नहीं, बल्कि फाइनल लैंडेड कॉस्ट है, जो अक्सर $120 प्रति बैरल को पार कर जाती है।
फ्यूल प्राइस पर सरकार का रुख
ग्लोबल मार्केट में कीमतों में भारी उछाल के बावजूद भारत में पेट्रोल और डीजल के दाम स्थिर हैं। इसका मतलब है कि सरकारी तेल मार्केटिंग कंपनियां (OMCs) और सरकार खुद इस लागत का बोझ उठा रही हैं, जिसे 'अंडर-रिकवरी' कहा जाता है। निवेशकों के लिए यह एक 'वॉच पॉइंट' है, क्योंकि अगर यह स्थिति लंबी खिंचती है, तो इन कंपनियों के मुनाफे और मार्जिन पर बुरा असर पड़ सकता है।
RBI और रुपया का मैनेजमेंट
भारतीय रुपया भी दबाव में है। पिछले 8 हफ्तों में विदेशी संस्थागत निवेशकों (FIIs) ने भारतीय बाजार से लगभग $11 बिलियन की निकासी की है। हालांकि, रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) ने रुपये को सहारा देने के लिए रणनीति अपनाई है, जिससे यह 94 से 96 के ट्रेडिंग बैंड में बना हुआ है। यह दखल इसलिए जरूरी है ताकि महंगाई का असर कम हो, क्योंकि कमजोर रुपया इंपोर्ट को और भी महंगा बना देता है।
आगे क्या होगा?
बाजार की नजरें अब नवंबर में होने वाले अमेरिकी चुनाव और पश्चिम एशिया की स्थिति पर टिकी हैं। ये बाहरी कारक ग्लोबल कमोडिटी मार्केट की दिशा तय करेंगे। निवेशकों को सलाह है कि वे तेल मार्केटिंग कंपनियों के बैलेंस शीट और आरबीआई की करेंसी मैनेजमेंट पर खास नजर रखें, क्योंकि यही भारतीय फाइनेंशियल मार्केट की सेहत तय करेंगे।
