भारत को साल 2036 तक **888 GWh** की विशाल एनर्जी स्टोरेज क्षमता खड़ी करनी है। फिलहाल देश में सिर्फ **7.5 GWh** क्षमता ही चालू है, जिससे यह सेक्टर भविष्य में निवेश के लिए एक बड़ा हॉटस्पॉट बन रहा है।
सेंट्रल इलेक्ट्रिसिटी अथॉरिटी (CEA) ने भारत के पावर ग्रिड के लिए एक महत्वाकांक्षी रोडमैप तैयार किया है। देश का लक्ष्य है कि 2035-36 तक 888 GWh की स्टोरेज क्षमता हासिल कर ली जाए। जैसे-जैसे भारत सोलर और विंड एनर्जी की ओर बढ़ रहा है, ग्रिड की स्थिरता एक बड़ी चुनौती बन गई है, क्योंकि पारंपरिक कोयला संयंत्रों के उलट ये स्रोत हमेशा बिजली की मांग के हिसाब से उपलब्ध नहीं होते।
स्टोरेज का नया गणित
CEA की योजना के अनुसार, इस लक्ष्य को पूरा करने के लिए दो मुख्य तकनीकों पर फोकस किया गया है: 321 GWh 'बैटरी एनर्जी स्टोरेज सिस्टम' (BESS) से और 567 GWh 'पंपड स्टोरेज प्रोजेक्ट्स' (PSPs) से आएगा। यह विविधता इसलिए जरूरी है ताकि किसी एक तकनीक पर निर्भर रहने के बजाय सप्लाई चेन के झटकों से बचा जा सके।
लक्ष्य बनाम हकीकत
जुलाई 2026 तक भारत में केवल 7.5 GWh स्टोरेज क्षमता ही चालू हो सकी है। इतने बड़े अंतर को पाटने के लिए सरकार ने 'वायबिलिटी गैप फंडिंग' (VGF) और मैन्युफैक्चरिंग इंसेंटिव जैसे कदमों का सहारा लिया है, ताकि कंपनियों के लिए प्रोजेक्ट्स की लागत कम हो सके।
निवेशकों के लिए चेतावनी
इस सेक्टर में अवसर तो बड़े हैं, लेकिन चुनौतियां भी कम नहीं हैं। पहला रिस्क है BESS प्रोजेक्ट्स की फाइनेंशियल वायबिलिटी—बैटरी की ऊंची लागत और प्रोजेक्ट बिड्स में मिलने वाले टैरिफ के बीच का गैप मुनाफा घटा सकता है। इसके अलावा, भारत का बैटरी सेल्स के लिए आयात पर निर्भर रहना और प्रोजेक्ट्स को समय पर पूरा करने का ट्रैक रिकॉर्ड निवेशकों के लिए चिंता का विषय हो सकता है। फिलहाल, ग्लोबल बैटरी कीमतों और सरकारी सब्सिडी योजनाओं पर नजर रखना मुनाफे के लिए जरूरी होगा।
