भारत में हर साल **62 मिलियन मीट्रिक टन (MMT)** कंप्रेस्ड बायोगैस (CBG) उत्पादन की अपार क्षमता है। इस सेक्टर को रफ्तार देने के लिए सरकार ने **₹23,731 करोड़** की 'गोवर्धन' (GOBARdhan) नेशनल सर्कुलर बायोएनर्जी स्कीम को मंजूरी दी है, जो इस उभरते बाजार के लिए गेम-चेंजर साबित हो सकती है।
भारत के पास 62 MMT सालाना कंप्रेस्ड बायोगैस (CBG) बनाने की क्षमता है, लेकिन वर्तमान में इसका इस्तेमाल 1% से भी कम हो रहा है। इस गैप को भरने के लिए केंद्र सरकार ने अगस्त 2026 में 'गोवर्धन' नेशनल सर्कुलर बायोएनर्जी स्कीम के तहत ₹23,731 करोड़ का आवंटन किया है, ताकि अगले एक दशक में इस सेक्टर को नई ऊंचाई मिल सके।
अनिवार्य ब्लेंडिंग से बाजार में आएगी स्थिरता
सरकार अब इस सेक्टर में डिमांड की गारंटी सुनिश्चित करना चाहती है। इसके लिए सिटी गैस डिस्ट्रीब्यूशन कंपनियों पर ब्लेंडिंग नियम लागू कर दिए गए हैं। फाइनेंशियल ईयर 2026-27 के लिए यह लक्ष्य 3% रखा गया है, जो 2027-28 में बढ़कर 4% और उसके बाद 5% हो जाएगा। इस कदम से उन कंपनियों को बड़ी राहत मिलेगी जो अब तक अनिश्चितता के कारण प्लांट लगाने से डर रहे थे।
रॉ-मटेरियल की उपलब्धता और चुनौतियां
देश में 472 MMT का रॉ-मटेरियल बेस है, जिसमें पशुओं का वेस्ट (41%) सबसे बड़ा स्रोत है। हालांकि, प्रेस मड (Sugar Mills waste) ऑपरेटर्स के लिए ज्यादा आकर्षक है क्योंकि यह आसानी से उपलब्ध है। इसके उलट, खेती से निकलने वाला कचरा (crop residue) सिर्फ 45 दिनों की विंडो में ही मिलता है, जिससे स्टोरेज और सप्लाई चेन की समस्या खड़ी होती है।
निवेशकों को किन बातों का रखना होगा ध्यान?
इन्वेस्टर्स को इस सेक्टर में एंट्री से पहले कुछ जोखिमों को भी समझना होगा। रूरल इलाकों से वेस्ट इकट्ठा करने की लॉजिस्टिक्स कॉस्ट काफी अधिक है। साथ ही, पाइपलाइन कनेक्टिविटी का अभाव और बिजली का भारी खर्च मुनाफे पर दबाव डाल सकता है। सेक्टर की सफलता पूरी तरह से इस पर निर्भर करेगी कि कंपनियां वेस्ट कलेक्शन और इंफ्रास्ट्रक्चर की बाधाओं को कितनी कुशलता से दूर करती हैं।
