भारत सरकार ने GOBARdhan स्कीम के तहत 2029 तक CNG में **3% से 5%** तक कंप्रेस्ड बायोगैस (CBG) मिलाने का अनिवार्य लक्ष्य रखा है। हालांकि, इंडस्ट्री एक्सपर्ट्स कार्बन न्यूट्रैलिटी के लिए **20%** ब्लेंडिंग की वकालत कर रहे हैं, जिससे सिटी गैस डिस्ट्रीब्यूशन (CGD) कंपनियों के इंफ्रास्ट्रक्चर और सप्लाई चेन पर नजर रखना जरूरी हो गया है।
भारत अपने ग्रीन एनर्जी ट्रांजिशन को रफ्तार देते हुए अब CNG सप्लाई चेन में कंप्रेस्ड बायोगैस (CBG) को शामिल कर रहा है। सरकार ने इसके लिए एक स्पष्ट रोडमैप तैयार किया है, जिसके तहत फाइनेंशियल ईयर 2026-27 में 3%, 2027-28 में 4% और 2028-29 तक 5% ब्लेंडिंग अनिवार्य होगी। ₹23,731 करोड़ की लागत वाली 'गोवर्धन' (GOBARdhan) स्कीम का मकसद विदेशी LNG पर निर्भरता कम करना और वेस्ट को फ्यूल में बदलना है।
इंडस्ट्री की मांग और चुनौतियां
जहां सरकार का लक्ष्य फिलहाल 5% है, वहीं TERI की एक रिपोर्ट बताती है कि सेक्टर को पूरी तरह कार्बन न्यूट्रल बनाने के लिए 20% तक ब्लेंडिंग की जरूरत पड़ सकती है। यह अंतर दर्शाता है कि आने वाले समय में सप्लाई इंफ्रास्ट्रक्चर और वेस्ट कलेक्शन के पैमाने को कितना बड़ा करने की जरूरत है।
CGD कंपनियों पर असर
Indraprastha Gas, Mahanagar Gas, और Gujarat Gas जैसी कंपनियों के लिए यह एक 'डबल-एज्ड स्वॉर्ड' जैसा है। सरकार ने CBG के लिए ₹2,110 प्रति MMBTU का प्रोक्योरमेंट प्राइस तय किया है, जो स्थिरता तो देता है, लेकिन हजारों डीसेंट्रलाइज्ड प्लांटों को मुख्य गैस ग्रिड से जोड़ना एक जटिल लॉजिस्टिक चुनौती है। परंपरागत गैस पाइपलाइनों के विपरीत, बायोगैस का उत्पादन बिखरा हुआ होता है, जिससे डिस्ट्रीब्यूटर्स के लिए सप्लाई मैनेजमेंट महंगा हो सकता है।
निवेशकों के लिए रिस्क फैक्टर्स
निवेशकों को अब ग्राउंड लेवल की एग्जीक्यूशन पर नजर रखनी चाहिए। फीडस्टॉक यानी कृषि और ऑर्गेनिक वेस्ट की सप्लाई मौसमी और बिखरी हुई होती है। यदि कच्चे माल की कमी हुई, तो प्लांटों का प्रोडक्शन प्रभावित होगा, जिससे CGD कंपनियों के ब्लेंडिंग टारगेट्स पूरा करने में अड़चन आ सकती है। इसके अलावा, प्लांट सेटअप और पाइपलाइन कनेक्टिविटी की बढ़ती लागत भविष्य में मार्जिन्स पर दबाव डाल सकती है। आने वाली तिमाहियों में नए प्लांट्स के कमीशनिंग और सप्लाई चेन की स्थिरता ही इस बिजनेस मॉडल की सफलता तय करेगी।
