Steel Sector में भारत का बड़ा दांव: ₹36,280 करोड़ के बूते 300MT कैपेसिटी का लक्ष्य

ENERGY
Whalesbook Logo
AuthorAditi Chauhan|Published at:
Steel Sector में भारत का बड़ा दांव: ₹36,280 करोड़ के बूते 300MT कैपेसिटी का लक्ष्य

केंद्रीय मंत्री एच.डी. कुमारस्वामी ने कहा है कि भारत को क्लीन एनर्जी में सिर्फ कंज्यूमर नहीं, बल्कि ग्लोबल मैन्युफैक्चरर बनना होगा। सरकार ने इलेक्ट्रिक मोबिलिटी, बैटरी प्रोडक्शन और क्रिटिकल मिनरल्स के लिए ₹36,280 करोड़ का बड़ा फंड जारी किया है, साथ ही 2030 तक 300 मिलियन टन स्टील कैपेसिटी का लक्ष्य रखा है।

भारत बनेगा एनर्जी प्रोडक्शन हब?

केंद्रीय इस्पात और भारी उद्योग मंत्री, एच.डी. कुमारस्वामी ने 6 अगस्त 2026 को कहा कि भारत की एनर्जी सिक्योरिटी बाहरी स्रोतों पर निर्भर रहने के बजाय डोमेस्टिक मैन्युफैक्चरिंग कैपेबिलिटीज बनाने में है। CII इंटरनेशनल एनर्जी कॉन्फ्रेंस में उन्होंने जोर देकर कहा कि भारत को क्लीन टेक्नोलॉजी का बड़ा कंज्यूमर होने की बजाय ग्लोबल एनर्जी ट्रांजिशन के लिए एक मुख्य प्रोडक्शन हब के तौर पर विकसित होना होगा।

₹36,280 करोड़ का बड़ा बूस्टर

इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए सरकार ने तीन प्रमुख क्षेत्रों में कुल ₹36,280 करोड़ का फंड आवंटित किया है। इसमें इलेक्ट्रिक मोबिलिटी को सपोर्ट करने के लिए PM E-DRIVE स्कीम के तहत ₹10,900 करोड़, एडवांस्ड केमिस्ट्री सेल (ACC) बैटरी स्टोरेज के लिए प्रोडक्शन लिंक्ड इंसेंटिव (PLI) स्कीम के तहत ₹18,100 करोड़, और सिंटर्ड रेयर अर्थ परमानेंट मैग्नेट के मैन्युफैक्चरिंग को बढ़ावा देने के लिए ₹7,280 करोड़ शामिल हैं। इस फंड का मकसद उन क्रिटिकल कंपोनेंट्स के लिए एक लोकल इकोसिस्टम तैयार करना है, जिन्हें फिलहाल इंपोर्ट किया जाता है।

स्टील सेक्टर बनेगा एनर्जी शिफ्ट का आधार

दुनिया के दूसरे सबसे बड़े स्टील प्रोड्यूसर के तौर पर, भारत इस एनर्जी शिफ्ट की नींव के रूप में स्टील इंडस्ट्री को तैयार कर रहा है। विंड टर्बाइन, हाइड्रोजन प्लांट और बैटरी फैक्टरी जैसे रिन्यूएबल एनर्जी इंफ्रास्ट्रक्चर के लिए स्पेशलाइज्ड स्टील की भारी मात्रा की जरूरत होती है। सरकार 2030 तक राष्ट्रीय स्टील बनाने की कैपेसिटी को 300 मिलियन टन तक बढ़ाने की कोशिश कर रही है, जिसमें इको-फ्रेंडली प्रोडक्शन मेथड्स पर खास जोर दिया जा रहा है। यह ट्रांजिशन न केवल डोमेस्टिक ग्रोथ को पूरा करने के लिए जरूरी है, बल्कि इंटरनेशनल मार्केट में कॉम्पिटिटिव बने रहने के लिए भी अहम है, जहां सस्टेनेबल प्रोडक्ट्स की डिमांड लगातार बढ़ रही है।

निवेशकों के लिए क्या है खास?

यह पॉलिसी डायरेक्शन हाई-वैल्यू मैन्युफैक्चरिंग और एनर्जी इंडिपेंडेंस की ओर एक स्ट्रेटेजिक बदलाव को दर्शाता है। इन इनिशिएटिव्स की सफलता डोमेस्टिक कंपनियों की प्रोजेक्ट्स को समय पर पूरा करने और कॉस्ट कॉम्पिटिटिवनेस बनाए रखने की क्षमता पर निर्भर करेगी। एक बड़ी चिंता इंपोर्टेड रॉ मैटेरियल्स पर इंडस्ट्री की निर्भरता बनी हुई है। जो कंपनियां डीकार्बोनाइजेशन की लागत को मैनेज करते हुए इन नई टेक्नोलॉजी को प्रभावी ढंग से इंटीग्रेट कर सकती हैं, वे लॉन्ग टर्म के लिए बेहतर स्थिति में हो सकती हैं।

सेक्टर पर नजर रखने वाले निवेशकों को इन सरकारी स्कीम्स से जुड़े प्रोजेक्ट्स की कमीशनिंग की स्पीड पर ध्यान देना चाहिए। PLI इंसेंटिव्स की इफेक्टिवनेस और स्टील कैपेसिटी का असल विस्तार, सेल्फ-रिलायंस की दिशा में सरकार के पुश से कौन सी कंपनियां लाभान्वित होंगी, यह तय करने में महत्वपूर्ण फैक्टर होंगे। जैसे-जैसे ये इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स सामने आएंगे, कैपेसिटी यूटिलाइजेशन और इंपोर्ट-सबस्टिट्यूशन प्रोग्रेस पर इंडस्ट्री अपडेट्स सेक्टर के ग्रोथ ट्रैजेक्टरी की स्पष्ट तस्वीर पेश करेंगे।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.