भारत ने 2047 तक परमाणु ऊर्जा क्षमता को **100GW** तक ले जाने का महत्वाकांक्षी प्लान बनाया है। SHANTI Act के जरिए प्राइवेट और विदेशी कंपनियों के लिए रास्ते खुलने से सेक्टर में **₹15 से ₹25 लाख करोड़** के बड़े निवेश की उम्मीद है।
भारत का एनर्जी विजन अब परमाणु ऊर्जा (Nuclear Energy) पर टिका है। सेंट्रल इलेक्ट्रिसिटी अथॉरिटी (CEA) के मुताबिक, साल 2035-36 तक देश की पीक पावर डिमांड 459 GW तक पहुंच जाएगी। इस मांग को पूरा करने और ग्रिड को स्टेबल रखने के लिए न्यूक्लियर पावर को 'बेसलोड' के तौर पर तैयार किया जा रहा है।
प्राइवेट सेक्टर की एंट्री से बदलेगा खेल
दिसंबर 2025 में लागू हुए 'SHANTI Act' (Sustainable Harnessing and Advancement of Nuclear Energy for Transforming India) ने इस सेक्टर का एकाधिकार खत्म कर दिया है। सरकार का अनुमान है कि 100 GW के कुल टारगेट में से 30 GW का योगदान प्राइवेट कंपनियां देंगी। इसके लिए निजी प्लेयर्स को लगभग ₹7.5 लाख करोड़ की भारी पूंजी लगाने की जरूरत होगी।
निवेशकों के लिए चुनौतियां और मौके
परमाणु ऊर्जा का खेल बाकी रिन्यूएबल सेक्टर से बिल्कुल अलग है। यहां 1 मेगावाट की क्षमता तैयार करने में ₹25 करोड़ का खर्च आता है।
- लंबा समय (Gestation Period): सोलर या विंड पावर की तरह यह प्रोजेक्ट्स कुछ महीनों में तैयार नहीं होते। एक न्यूक्लियर प्लांट को बनने में 5 से 7 साल का समय लगता है, जिससे डेट सर्विसिंग का दबाव काफी बढ़ जाता है।
- टैरिफ की जंग: सोलर और विंड एनर्जी की घटती लागत के सामने न्यूक्लियर बिजली की कीमत ज्यादा हो सकती है, जिससे सरकारी डिस्कॉम (Discoms) के साथ बिजली खरीद समझौते (PPA) करना एक चुनौती हो सकता है।
- इन्श्योरेंस का अभाव: अभी भी न्यूक्लियर-स्पेशलाइज्ड इन्श्योरेंस की कमी है, जो लेंडर्स के लिए रिस्क बढ़ाती है।
NTPC और बड़े खिलाड़ियों पर नजर
NTPC Limited इस सेक्टर में सबसे आगे है। कंपनी ने अपने ₹17 लाख करोड़ के निवेश प्लान के तहत 30 GW न्यूक्लियर क्षमता का टारगेट रखा है। निवेशकों को केवल सरकारी घोषणाओं पर नहीं, बल्कि कंपनियों के ऑर्डर बुक, फ्यूल सप्लाई सिक्योरिटी (जैसे यूरेनियम) और प्रोजेक्ट्स को समय पर पूरा करने के ट्रैक रिकॉर्ड पर नजर रखनी चाहिए।
