भारत ने **2030** तक **100 मिलियन टन** कोल गैसीफिकेशन क्षमता हासिल करने का लक्ष्य रखा है। इसका मुख्य मकसद मेथेनॉल और नेचुरल गैस पर निर्भरता को कम करना है। इस मिशन के लिए **₹3 लाख करोड़** के बड़े निवेश की जरूरत है, जिसमें **25** प्रोजेक्ट्स पर काम किया जाएगा।
आयात कम करने की कवायद
भारत सरकार ऊर्जा के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनने के लिए एक बड़ा कदम उठा रही है। वर्तमान स्थिति यह है कि भारत अपनी मेथेनॉल जरूरत का करीब 94% और नेचुरल गैस का 50% आयात करता है। इसके लिए देश को हर साल ₹1.6 लाख करोड़ से ज्यादा का भारी-भरकम बिल चुकाना पड़ता है। अब घरेलू कोयले को गैस में बदलकर इस निर्भरता को खत्म करने की योजना है।
बड़े निवेश और चुनौतियां
इस मिशन को पूरा करने के लिए ₹2.5 लाख करोड़ से ₹3 लाख करोड़ के निवेश की दरकार है। इतनी बड़ी राशि को जुटाने के लिए प्राइवेट सेक्टर की भागीदारी बहुत जरूरी है। हालांकि, तकनीकी मोर्चे पर भारतीय कोयले की क्वालिटी एक बड़ी बाधा है। भारतीय कोयले में ऐश कंटेंट (Ash Content) बहुत ज्यादा होता है, जिससे मौजूदा गैसीफिकेशन तकनीक को चलाने में मुश्किलें आती हैं। इसके लिए अब स्थानीय R&D पर जोर दिया जा रहा है ताकि लागत को कम रखा जा सके।
सरकारी मदद और बिजनेस मॉडल
प्रोजेक्ट्स की सफलता के लिए एक 'सिंगल-विंडो' अप्रूवल सिस्टम की मांग की जा रही है ताकि लालफीताशाही से बचा जा सके। वहीं, बिजनेस मॉडल को सफल बनाने के लिए 'ऑफटेक एग्रीमेंट' (Offtake Agreements) पर जोर दिया जा रहा है। इसका उदाहरण 'कोल इंडिया' (Coal India) की सब्सिडियरी, भारत कोल गैसीफिकेशन एंड केमिकल्स लिमिटेड है, जो लखनपुर प्रोजेक्ट में अमोनियम नाइट्रेट का इस्तेमाल खुद ही कर रही है।
निवेशकों को अब प्रोजेक्ट्स के जमीन अधिग्रहण, सरकारी प्रोत्साहन और लंबी अवधि के ऑफटेक एग्रीमेंट्स पर नजर रखनी चाहिए, क्योंकि इन्हीं से इन कंपनियों की असल कमाई तय होगी।
