भारत सरकार ने 2047 तक **100 GW** न्यूक्लियर पावर क्षमता हासिल करने का रोडमैप तैयार किया है। SHANTI Act 2025 के जरिए प्राइवेट सेक्टर को भी इसमें शामिल किया जाएगा, जिसके लिए **₹7.5 लाख करोड़** के भारी-भरकम निवेश की जरूरत होगी।
भारत के एनर्जी सेक्टर में एक बड़ा स्ट्रक्चरल बदलाव होने जा रहा है। अब तक न्यूक्लियर पावर पर सरकारी एकाधिकार था, लेकिन अब सरकार प्राइवेट और विदेशी निवेश के लिए दरवाजे खोल रही है। SHANTI Act 2025 के तहत न्यूक्लियर प्रोजेक्ट्स में अब 49% तक प्राइवेट और विदेशी इक्विटी की अनुमति होगी।
लक्ष्य और निवेश का गणित
इस महत्वाकांक्षी लक्ष्य के लिए ₹7.5 लाख करोड़ के कैपिटल खर्च की जरूरत है। सरकारी कंपनी NPCIL मुख्य भूमिका निभाती रहेगी, लेकिन 30 GW का लक्ष्य प्राइवेट सेक्टर के लिए रखा गया है। सरकार इसमें बड़े इंडिजिनस रिएक्टर्स के साथ-साथ 'Bharat Small Reactors' (BSRs) का इस्तेमाल करेगी, जो मौजूदा बड़े पावर प्लांट्स के मुकाबले अधिक फ्लेक्सिबल होंगे।
चुनौतियां और रिस्क (Execution Risks)
निवेशकों को यह समझना होगा कि न्यूक्लियर प्रोजेक्ट्स बेहद कैपिटल-इंटेन्सिव होते हैं। इनकी निर्माण लागत सोलर या विंड पावर की तुलना में काफी ज्यादा है। साथ ही, इनके निर्माण में लंबा समय लगता है, जिससे कैश फ्लो और रिटर्न्स में अनिश्चितता बनी रहती है।
सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि सरकार क्या ऐसा 'बैंकable' फ्रेमवर्क बना पाती है जो प्राइवेट निवेशकों को आकर्षित कर सके। इसके अलावा, हाई-टेक न्यूक्लियर इक्विपमेंट के लिए एक मजबूत लोकल वेंडर इकोसिस्टम तैयार करना भी सबसे बड़ी चुनौती होगी। मार्केट अब पायलट प्रोजेक्ट्स की घोषणा और फाइनेंशियल मॉडल्स की स्पष्टता पर नजर टिकाए बैठा है।
