दोहरा संदेश: स्टॉक है, पर बचत भी जरूरी
सरकार की ओर से ऊर्जा सुरक्षा को लेकर एक मिला-जुला संदेश आ रहा है। एक तरफ, ऑयल सेक्रेटरी नीरज मित्तल ने साफ किया है कि देश के पास कच्चे तेल और पेट्रोलियम उत्पादों का 60 दिन का मजबूत स्टॉक मौजूद है, जिससे फिलहाल किसी भी तरह की राशनिंग की कोई योजना नहीं है। डोमेस्टिक सप्लाई (domestic supply) पर्याप्त है।
वहीं, दूसरी ओर, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रविवार को देशवासियों से ईंधन की खपत में भारी कटौती करने की फौरन अपील की। पीएम ने वर्क फ्रॉम होम (work from home), पब्लिक ट्रांसपोर्ट (public transport) का इस्तेमाल, कारपूलिंग (carpooling) और गैर-जरूरी खर्चों में कटौती कर विदेशी मुद्रा (foreign exchange) बचाने का सुझाव दिया। यह कदम भू-राजनीतिक अस्थिरता (geopolitical instability) और ग्लोबल एनर्जी प्राइस (global energy prices) में उछाल को देखते हुए उठाया गया है। यह विरोधाभासी संकेत, जनता की धारणा को संभालने के साथ-साथ भारत की एनर्जी निर्भरता (energy reliance) में बदलाव लाने की एक सोची-समझी रणनीति की ओर इशारा करते हैं।
मार्केट पर असर: एविएशन स्टॉक्स में गिरावट
इन मिले-जुले संकेतों का कुछ सेक्टर पर फौरन असर देखा गया। InterGlobe Aviation (IndiGo) और SpiceJet जैसी एविएशन स्टॉक्स (aviation stocks) में 4% तक की गिरावट आई। निवेशकों को चिंता है कि खर्चों में कटौती से खास तौर पर विदेशी यात्राओं पर असर पड़ सकता है। यह सेक्टर-स्पेसिफिक प्रेशर (sector-specific pressure) बताता है कि मार्केट नीतिगत संकेतों के प्रति कितना संवेदनशील है और लगातार ऊंचे एनर्जी कॉस्ट (energy costs) से आर्थिक चुनौतियां बढ़ सकती हैं।
इस बीच, Brent क्रूड ऑयल (Brent crude oil) की कीमतें $103.90 प्रति बैरल के आसपास बनी हुई हैं, जो अप्रैल में वेस्ट एशिया (West Asia) संघर्ष के चलते $110 के पार चली गई थीं। यह अस्थिरता ग्लोबल सप्लाई चेन (global supply chain) के जोखिमों को रेखांकित करती है।
भारत का रिजर्व और ग्लोबल तुलना
जहां ऑयल सेक्रेटरी ने 60 दिन के रिजर्व का जिक्र किया, वहीं कुछ अन्य विश्लेषणों के अनुसार, भारत के स्ट्रेटेजिक पेट्रोलियम रिजर्व (SPR) में लगभग 45 दिन का इम्पोर्ट (import) कवर हो सकता है। कमर्शियल स्टॉक (commercial stock) को मिलाकर यह आंकड़ा करीब 74 दिन की खपत तक पहुंच जाता है। यह कवरेज प्रमुख वैश्विक अर्थव्यवस्थाओं जैसे अमेरिका ( 90 दिन से अधिक), चीन ( 90-130 दिन), और जापान ( 200 दिन तक) से काफी पीछे है। भारत की कुल स्ट्रेटेजिक रिजर्व क्षमता लगभग 53 लाख टन है, और इसे बढ़ाने की योजनाएं हैं।
वर्तमान भू-राजनीतिक स्थिति के कारण वैश्विक स्तर पर तेल और डेरिवेटिव (derivative) उत्पादन में अनुमानित 10% की कमी आई है। भारत जैसे इमर्जिंग मार्केट्स (emerging markets) अपनी आयात निर्भरता (import reliance) के कारण विशेष रूप से कमजोर हैं, क्योंकि देश अपनी 85% से अधिक क्रूड ऑयल (crude oil) की जरूरतों के लिए आयात पर निर्भर है।
ऊंचे तेल दामों का आर्थिक खतरा
आयातित कच्चे तेल पर भारत की भारी निर्भरता के कारण इसकी अर्थव्यवस्था लगातार ऊंचे दामों के प्रति बहुत संवेदनशील है। तेल की कीमतों में $10 प्रति बैरल की बढ़ोतरी भी चालू खाता घाटे (current account deficit - CAD) को GDP के 0.4% से 0.5% तक बढ़ा सकती है। मौजूदा ऊंचे दाम और सप्लाई में रुकावट के जोखिम महंगाई (inflation) को बढ़ा सकते हैं, रुपये (rupee) पर दबाव डाल सकते हैं और विदेशी मुद्रा भंडार (forex reserves) को और कम कर सकते हैं।
एविएशन सेक्टर के लिए, ऊंचे फ्यूल कॉस्ट (fuel costs) और घटती यात्री संख्या (reduced discretionary travel) का दोहरा दबाव एक बड़ी चुनौती है। SpiceJet जैसी एयरलाइंस विशेष रूप से कमजोर स्थिति में हैं, जिनके शेयरधारक इक्विटी (shareholder equity) निगेटिव और कर्ज भारी है। वे लंबे समय तक आर्थिक मंदी या लागत वृद्धि का सामना करने की स्थिति में नहीं हैं। वहीं IndiGo बेहतर लिक्विडिटी (liquidity) और प्रॉफिटेबिलिटी (profitability) दिखाती है, पर पूरा सेक्टर मैक्रोइकॉनॉमिक (macroeconomic) बदलावों और फ्यूल प्राइस वोलेटिलिटी (fuel price volatility) के प्रति संवेदनशील बना हुआ है।
ग्रीन एनर्जी की ओर भारत का कदम
इन लगातार बनी हुई कमजोरियों के जवाब में, भारत विविधीकरण (diversification) और रिन्यूएबल व ग्रीन एनर्जी (renewable and green energy) स्रोतों की ओर एक मजबूत कदम उठाकर लंबी अवधि की ऊर्जा सुरक्षा हासिल करने के लिए तेजी से काम कर रहा है। जनवरी 2023 में लॉन्च किए गए नेशनल ग्रीन हाइड्रोजन मिशन (National Green Hydrogen Mission) का लक्ष्य भारी निवेश आकर्षित करना और भारत को हाइड्रोजन उत्पादन और निर्यात में वैश्विक लीडर बनाना है।
सौर, पवन और बायोएनर्जी (bioenergy) पर निरंतर ध्यान देने के साथ, यह रणनीति आयातित जीवाश्म ईंधन (fossil fuels) पर निर्भरता कम करने और अस्थिर वैश्विक ऊर्जा बाजारों के जोखिम को कम करने के लिए तैयार की गई है। नॉन-फॉसिल फ्यूल कैपेसिटी (non-fossil fuel capacity) के महत्वाकांक्षी लक्ष्यों और रिन्यूएबल टेक्नोलॉजीज (renewable technologies) के लिए बढ़ते घरेलू विनिर्माण आधार के साथ, भारत अपनी ऊर्जा परिदृश्य को लचीलापन (resilience) और स्थिरता (sustainability) के लिए रणनीतिक रूप से पुन: कैलिब्रेट (recalibrate) कर रहा है।
