India Solar Sector: 217 GW क्षमता के बावजूद आयात पर भारी निर्भरता, मार्जिन पर दबाव का खतरा

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AuthorKaran Malhotra|Published at:
India Solar Sector: 217 GW क्षमता के बावजूद आयात पर भारी निर्भरता, मार्जिन पर दबाव का खतरा

भारत की सोलर एनर्जी मैन्युफैक्चरिंग क्षमता **217 GW** को पार कर गई है। लेकिन, एक बड़ी समस्या यह है कि देश पॉलीसिलिकॉन और वेफर्स जैसे ज़रूरी पार्ट्स के लिए अभी भी आयात पर बहुत ज़्यादा निर्भर है। सरकार नई पॉलिसीज़ ला रही है, पर यह निर्भरता सप्लाई चेन की स्थिरता और कंपनियों के मुनाफे पर भारी पड़ सकती है।

सोलर एनर्जी में भारत की बड़ी छलांग

भारत ने सोलर एनर्जी मैन्युफैक्चरिंग के क्षेत्र में ज़बरदस्त तरक्की की है। अगस्त 2026 तक, 'Approved List of Models and Manufacturers' (ALMM) के तहत देश की मॉड्यूल मैन्युफैक्चरिंग क्षमता 217,107 MW तक पहुंच गई है। यह भारत के रिन्यूएबल एनर्जी को बढ़ावा देने के लक्ष्य का एक अहम हिस्सा है, क्योंकि नॉन-फॉसिल फ्यूल क्षमता 300 GW के पार जा चुकी है।

आयात पर निर्भरता: एक बड़ी चुनौती

लेकिन इस चमकदार तस्वीर के पीछे एक गहरी समस्या छिपी है। भारत सोलर सेल बनाने के लिए ज़रूरी अहम पार्ट्स जैसे पॉलीसिलिकॉन, इंगॉट्स और वेफर्स के लिए लगभग पूरी तरह से आयात पर निर्भर है। इसका मतलब है कि देश में ज़्यादातर काम मॉड्यूल को असेंबल करने का होता है, न कि पूरी तरह से मैन्युफैक्चरिंग का। ये ज़रूरी पार्ट्स बड़े पैमाने पर चीन से मंगाए जाते हैं, जो ग्लोबल सप्लाई में सबसे आगे है।

इस निर्भरता से भारतीय सोलर सेक्टर के लिए एक बड़ा खतरा पैदा हो गया है। अगर सप्लाई चेन में कोई रुकावट आती है या इन रॉ-मटेरियल की ग्लोबल कीमतों में अचानक उछाल आता है, तो घरेलू मैन्युफैक्चरर्स के पास इनपुट कॉस्ट को कंट्रोल करने के ज़्यादा विकल्प नहीं होंगे। ऐसे में, ग्लोबल मार्केट में कीमतों में होने वाला कोई भी छोटा-बड़ा बदलाव सीधे तौर पर उन कंपनियों के प्रॉफिट मार्जिन पर दबाव डाल सकता है, जिनके पास खुद की अपस्ट्रीम प्रोडक्शन फैसिलिटीज़ नहीं हैं।

सरकार की नई पहलें

इस स्थिति से निपटने के लिए सरकार ने कुछ कड़े कदम उठाने शुरू कर दिए हैं। जून 2026 से, सरकारी सोलर प्रोजेक्ट्स में ऐसे मॉड्यूल्स का इस्तेमाल करना ज़रूरी होगा जिनमें डोमेस्टिक रूप से बने सेल्स हों। इसका मकसद कंपनियों को सिर्फ असेंबलिंग से आगे बढ़कर ज़्यादा वैल्यू-एडेड प्रोडक्शन की ओर ले जाना है। इसके अलावा, मिनिस्ट्री ऑफ न्यू एंड रिन्यूएबल एनर्जी (MNRE) एक नई प्रोडक्शन-लिंक्ड इंसेंटिव (PLI) स्कीम लाने की तैयारी कर रही है, जो खासतौर पर डोमेस्टिक पॉलीसिलिकॉन मैन्युफैक्चरिंग को सपोर्ट करेगी। सरकार का लक्ष्य इस सेगमेंट में कम से कम 10 GW की क्षमता हासिल करना है, ताकि लंबे समय में आयात पर निर्भरता कम की जा सके।

निवेशकों के लिए क्या है खास?

बाजार के जानकारों और निवेशकों के लिए यह स्थिति मिली-जुली है। एक तरफ, सरकार की लोकल सप्लाई चेन को मजबूत करने की कोशिश उन कंपनियों के लिए मौके बना रही है जो बैकवर्ड इंटीग्रेशन में निवेश करती हैं, यानी मॉड्यूल असेंबल करने से आगे बढ़कर सेल और वेफर बनाने का काम शुरू करती हैं। दूसरी तरफ, इस बदलाव में कुछ रिस्क भी हैं। हाई-टेक अपस्ट्रीम फैसिलिटीज़ बनाने के लिए भारी-भरकम कैपिटल इन्वेस्टमेंट और खास टेक्निकल स्किल की ज़रूरत होगी।

इसके अलावा, 'ऑपर्च्युनिटी कॉस्ट' का भी एक फाइनेंशियल रिस्क है। छोटी अवधि में, सस्ते इंपोर्टेड पार्ट्स की जगह डोमेस्टिक मैन्युफैक्चरिंग को प्राथमिकता देने से प्रोजेक्ट कॉस्ट बढ़ सकती है, जो नए सोलर एनर्जी इंस्टॉलेशन्स की वायबिलिटी को अस्थायी रूप से प्रभावित कर सकती है। भविष्य में, इस सेक्टर के लिए सबसे महत्वपूर्ण चीज़ें होंगी नई PLI स्कीम की सफलता, डोमेस्टिक प्लेयर्स द्वारा सेल और वेफर प्रोडक्शन को कितनी जल्दी बढ़ाया जाता है, और कैसे कंपनियां उन ग्लोबल मार्केट्स में अपनी रॉ-मटेरियल प्रोक्योरमेंट कॉस्ट को मैनेज करती हैं जिन पर कुछ बड़े सप्लायर्स का दबदबा है।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.