भारत का सोलर सेक्टर दोहरी मुश्किल में फंस गया है। एक तरफ अमेरिकी एंटी-डंपिंग ड्यूटी से एक्सपोर्ट बंद हो गया है, तो दूसरी तरफ घरेलू ग्रिड में बिजली की अधिकता से प्रोजेक्ट्स का मुनाफा खतरे में है।
अगस्त 2026 तक 168 GW की स्थापित क्षमता तक पहुंचने के बाद, भारत का सोलर सेक्टर एक बड़े स्ट्रक्चरल रोडब्लॉक से गुजर रहा है। सेक्टर के सामने मुख्य रूप से दो बड़ी चुनौतियां खड़ी हैं—अमेरिकी बाजार में एक्सपोर्ट का बंद होना और घरेलू ग्रिड मैनेजमेंट की समस्या।
अमेरिका के ट्रेड बैरियर्स का असर
भारतीय सोलर मॉड्यूल निर्माताओं के लिए अमेरिका एक बड़ा एक्सपोर्ट मार्केट था। लेकिन अब अमेरिकी डिपार्टमेंट ऑफ कॉमर्स ने 200% से ज्यादा की एंटी-डंपिंग और काउंटरवेलिंग ड्यूटी लगा दी है। इसके कारण भारतीय कंपनियों का हाई-मार्जिन वाला बिजनेस पूरी तरह ठप हो गया है। अमेरिका अपनी 'इन्फ्लेशन रिडक्शन एक्ट' के तहत घरेलू मैन्युफैक्चरिंग को बढ़ावा दे रहा है, जिससे भारतीय कंपनियों को अब कम मार्जिन वाले घरेलू बाजार पर निर्भर होना पड़ रहा है।
मैन्युफैक्चरिंग और ग्रिड इम्बैलेंस
सोलर सेक्टर अभी तक मॉड्यूल असेंबली लाइन्स पर निर्भर था, जो सेल और वेफर प्रोडक्शन के मुकाबले सस्ती पड़ती थीं। अब कंपनियों पर अपस्ट्रीम मैन्युफैक्चरिंग में पैसा लगाने का दबाव है, जिससे शॉर्ट-टर्म कैश फ्लो और कर्ज पर भारी असर पड़ रहा है।
साथ ही, दोपहर के समय सोलर बिजली की अधिकता के कारण 'मिडडे ग्लट' (Midday Glut) की स्थिति बन रही है। इसके चलते 'इंडियन एनर्जी एक्सचेंज' पर बिजली की कीमतें कभी-कभी 0 (जीरो) के करीब पहुंच जाती हैं। ग्रिड ऑपरेटरों द्वारा कर्टेलमेंट (बिजली कटौती) के आदेश से डेवलपर्स के प्रोजेक्ट्स का रिटर्न बुरी तरह प्रभावित हो रहा है।
स्टोरेज और बढ़ती लागत का संकट
इंटरमिटेंट पावर सप्लाई को संभालने के लिए बैटरी स्टोरेज एकमात्र विकल्प है, लेकिन 2026 में लिथियम कार्बोनेट जैसे जरूरी कंपोनेंट्स की कीमतें बढ़ने से प्रोजेक्ट्स की लागत बढ़ गई है। 2024 और 2025 में कम कीमतों पर बोली लगाने वाली कंपनियों के लिए अब मुनाफा कमाना चुनौतीपूर्ण हो गया है। निवेशक अब इन कंपनियों के डेट मैनेजमेंट और मार्जिन पर कड़ी नजर रख रहे हैं।
