भारत का सोलर सेक्टर अब **168 GW** की क्षमता तक पहुंच चुका है, लेकिन ग्रिड की सीमित क्षमता के कारण कंपनियों को भारी नुकसान उठाना पड़ रहा है। सरकार ने जुलाई 2027 से नए प्रोजेक्ट्स के लिए बैटरी स्टोरेज को अनिवार्य कर दिया है, जिससे अब कंपनियां हाइब्रिड मॉडल की ओर बढ़ रही हैं।
भारत का सोलर सेक्टर तेजी से आगे तो बढ़ रहा है, लेकिन अब एक बड़ी तकनीकी चुनौती सामने खड़ी है। मौजूदा पावर ग्रिड सोलर एनर्जी के उतार-चढ़ाव को संभालने में संघर्ष कर रहा है। दिन के समय जब सोलर प्रोडक्शन पीक पर होता है, तो ग्रिड पर लोड बढ़ जाता है। इस वजह से ग्रिड ऑपरेटर्स को 'कर्टेलमेंट' करना पड़ता है, यानी धूप होने के बावजूद सोलर प्लांट को पावर बंद करने का निर्देश दिया जाता है।
डेवलपर्स पर ग्रिड कर्टेलमेंट की मार
यह केवल एक तकनीकी समस्या नहीं है, बल्कि इसका सीधा असर कंपनियों के मुनाफे पर पड़ रहा है। साल 2026 की पहली तिमाही में ट्रांसमिशन बाधाओं के कारण 300 GWh बिजली बर्बाद हो गई। इसका मतलब है कि भारी निवेश के बावजूद कंपनियों को उस ऊर्जा का कोई दाम नहीं मिला। पावर एक्सचेंज में भी अस्थिरता बढ़ गई है, जहां दिन में कीमतें शून्य तक गिर जाती हैं, जबकि शाम की पीक डिमांड के समय कीमतें रेगुलेटरी कैप तक पहुंच जाती हैं।
हाइब्रिड और स्टोरेज मॉडल की ओर बढ़ाव
इन समस्याओं को देखते हुए सेंट्रल इलेक्ट्रिसिटी अथॉरिटी (CEA) ने एक बड़ा नीतिगत बदलाव किया है। जुलाई 2027 से नए सोलर और विंड प्रोजेक्ट्स को अपनी क्षमता का कम से कम 10% बैटरी एनर्जी स्टोरेज सिस्टम (BESS) के साथ जोड़ना अनिवार्य होगा, जिसमें 2-घंटे का डिस्चार्ज बैकअप होना जरूरी है। इसका लक्ष्य 2032 तक 236 GWh की स्टोरेज क्षमता हासिल करना है ताकि शाम की बिजली की मांग को आसानी से पूरा किया जा सके।
निवेशकों के लिए क्या है जरूरी?
यह नया नियम कंपनियों के लिए कैपिटल एक्सपेंडिचर यानी शुरुआती खर्च बढ़ाएगा। निवेशकों को अब यह ट्रैक करना होगा कि कौन सी कंपनियां इस बढ़ते खर्च को मैनेज करके मुनाफा बनाए रखने में सक्षम हैं। जो कंपनियां इस हाइब्रिड मॉडल को जल्दी अपनाएंगी, लंबी अवधि में वही मार्केट में टिक पाएंगी।
