वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल के दाम $100 से $120 प्रति बैरल तक पहुँच गए हैं, जिसका मुख्य कारण पश्चिमी एशिया में बढ़ता भू-राजनीतिक तनाव और जलमार्गों पर आने वाली दिक्कतें हैं। इसी को देखते हुए, भारतीय सरकार ने एक सक्रिय रणनीति अपनाई है। इसके तहत, सरकार ने न केवल पेट्रोल और डीज़ल की कीमतों की हर पखवाड़े समीक्षा करने का नया सिस्टम लागू किया है, बल्कि एक्साइज ड्यूटी में भी ₹10 प्रति लीटर की कटौती की है।
यह दो-तरफा रणनीति ऑयल मार्केटिंग कंपनियों (OMCs) जैसे Indian Oil Corporation (IOC), Bharat Petroleum Corporation (BPCL), और Hindustan Petroleum Corporation (HPCL) को हो रहे भारी वित्तीय नुकसान, जिसे 'अंडर-रिकवरी' कहा जाता है, को कम करने के लिए है। एक्साइज ड्यूटी में यह कटौती पेट्रोल पर ₹10 प्रति लीटर तक है, जिससे यह घटकर ₹3 प्रति लीटर हो गई है, और डीज़ल पर यह लगभग पूरी तरह से खत्म हो गई है (पहले ₹10 प्रति लीटर थी)। सरकारी खजाने पर इस कटौती का अनुमानित खर्च करीब ₹1,500 करोड़ होगा, और सालाना यह ₹1.5 से ₹1.6 लाख करोड़ तक पहुँच सकता है। खास बात यह है कि इस राहत का फायदा सीधे उपभोक्ताओं को नहीं मिलेगा; खुदरा कीमतें स्थिर रखी गई हैं ताकि महंगाई पर तुरंत असर न पड़े और OMCs की सप्लाई बनी रहे।
हालांकि, सरकार के इस कदम के बावजूद, कई ब्रोकरेज फर्मों ने सेक्टर पर चिंता जताई है। Ambit Institutional Equities ने IOC, BPCL, और HPCL की रेटिंग को 'Sell' कर दिया है, उनका मानना है कि कच्चे तेल की ऊंची कीमतें और यह राहत OMCs के लिए पर्याप्त नहीं होगी। Goldman Sachs ने भी IOC के लिए 'Sell' और BPCL व HPCL के लिए 'Neutral' रेटिंग दी है। इन चिंताओं के चलते मार्च 2026 में OMCs के शेयरों में 15-25% तक की गिरावट देखने को मिली थी।
ऊंचे वैश्विक ऊर्जा दाम भारत के महंगाई लक्ष्य के लिए बड़ा खतरा पैदा कर सकते हैं। विश्लेषकों का अनुमान है कि फाइनेंशियल ईयर 2027 में खुदरा महंगाई (CPI) ऊर्जा लागत के कारण औसतन 4.5% रह सकती है, जबकि थोक मूल्य सूचकांक (WPI) 5.5% तक पहुँच सकता है। इससे ब्याज दरों में कटौती में देरी हो सकती है और शेयर बाजार पर भी दबाव आ सकता है। भारत अपनी 85-90% कच्चे तेल की जरूरतों को आयात करता है, ऐसे में कच्चे तेल के दाम में हर $10 प्रति बैरल की बढ़ोतरी से GDP ग्रोथ 30-40 बेसिस पॉइंट कम हो सकती है और चालू खाते का घाटा (Current Account Deficit) बढ़ सकता है।
मार्च 2026 के अंत तक, OMCs के वित्तीय आंकड़े मिले-जुले हैं। IOC का मार्केट कैप लगभग ₹1.94 लाख करोड़ और P/E रेशियो करीब 6.19 है। BPCL का मार्केट कैप करीब ₹1.23 लाख करोड़ और P/E लगभग 5.02 है, जबकि HPCL का मार्केट कैप लगभग ₹715.59 अरब और P/E रेशियो करीब 4.65 है। हालांकि ये P/E रेशियो कम लग सकते हैं, पर मार्जिन पर लगातार दबाव और हालिया एनालिस्ट डाउनग्रेड्स के चलते निवेशक भविष्य की आय को लेकर सतर्क हैं।
सरकार के इस कदम से राजकोषीय घाटा (Fiscal Deficit) टारगेट से ऊपर जा सकता है। यदि ऊर्जा की कीमतें ऊंची बनी रहीं, तो यह घाटा GDP के 4.5% के लक्ष्य को पार कर सकता है। OMCs के लिए, उपभोक्ताओं से कीमत न बढ़ाकर लागत सोखना उनके मुनाफे को कम करेगा और वित्तीय नुकसान जारी रखेगा। Kotak Institutional Equities के एनालिस्ट FY27 में कच्चे तेल की कीमत $85 प्रति बैरल रहने का अनुमान लगा रहे हैं, जो बताता है कि उच्च लागत का दबाव बना रहेगा। इससे OMCs की बैलेंस शीट कमजोर हो सकती है और सरकारी मुआवजे में देरी हो सकती है।
सरकार का पखवाड़ेवार समीक्षा का निर्णय बाजार की निरंतर अस्थिरता की उम्मीद को दर्शाता है। जहां Morgan Stanley जैसी कुछ फर्मों ने ऊर्जा कंपनियों पर 'Overweight' रेटिंग बनाए रखी है, वहीं Ambit और Goldman Sachs जैसे कई अन्य इस सेक्टर के लिए 'Sell' या 'Neutral' रेटिंग दे रहे हैं। सेक्टर का भविष्य पश्चिमी एशिया के संघर्ष की अवधि, कच्चे तेल की कीमतों के रुख और सरकार की सहायता क्षमता पर निर्भर करेगा।