Strait of Hormuz में आए सप्लाई संकट के बाद भारत ने अब गल्फ देशों की जगह अमेरिका को अपना प्रमुख LPG स्रोत बना लिया है। मार्च 2026 से अमेरिका से होने वाला आयात **50%** के आंकड़े को पार कर चुका है, जो OMCs के लिए लॉजिस्टिक और फ्रेट कॉस्ट की नई चुनौतियां लेकर आया है।
फरवरी 2026 में Strait of Hormuz के बंद होने के बाद भारत ने अपनी LPG सप्लाई चेन को पूरी तरह से बदल दिया है। कभी अपनी 90% जरूरत के लिए गल्फ देशों पर निर्भर रहने वाला भारत अब तेजी से अमेरिका की ओर मुड़ गया है।
नई सप्लाई डील और चुनौतियां
भारत ने साल 2026 के लिए 2.2 मिलियन टन US LPG के लिए लॉन्ग-टर्म कॉन्ट्रैक्ट साइन किए हैं। गल्फ देशों के पारंपरिक प्राइसिंग मॉडल के उलट, अमेरिकी सप्लाई अब Mont Belvieu डेली स्पॉट प्राइस से जुड़ी है। हालांकि इससे क्रूड के उतार-चढ़ाव से तो राहत मिली है, लेकिन लंबी समुद्री दूरी के कारण फ्रेट (भाड़ा) की लागत बढ़ गई है।
OMCs पर क्या होगा असर?
Indian Oil Corporation, Bharat Petroleum और Hindustan Petroleum जैसी सरकारी कंपनियों के लिए यह बदलाव काफी महत्वपूर्ण है। चूँकि LPG की रिटेल कीमतें सरकार द्वारा नियंत्रित होती हैं, इसलिए अमेरिका से आने वाले ईंधन की ऊंची लागत इनके ऑपरेटिंग मार्जिन पर दबाव डाल सकती है, जब तक कि सरकार उन्हें सब्सिडी के जरिए राहत न दे।
स्थिति में सुधार के संकेत
7 सितंबर, 2026 को सरकार द्वारा ग्रामीण क्षेत्रों में LPG रिफिल के लिए वेटिंग पीरियड को 45 दिन से घटाकर 25 दिन करना यह दर्शाता है कि शुरुआती सप्लाई संकट अब काफी हद तक कम हो गया है। हालांकि, लॉन्ग-डिस्टेंस आयात के कारण अब भारत का यह सेक्टर डॉलर-रुपया एक्सचेंज रेट और ग्लोबल फ्रेट मार्केट के प्रति ज्यादा संवेदनशील हो गया है। निवेशकों के लिए आने वाली तिमाहियों के रिजल्ट्स में OMCs के प्रॉफिट मार्जिन पर नजर रखना बेहद जरूरी होगा।
